मन में स्तवन, शरीर में शक्ति
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (इन्द्रः) = वे परमैश्वर्यशाली प्रभु (उक्थेन) = स्तोत्रों के हेतु से तथा (शवसा) = बल के हेतु से (परुः) = पालन व पूरण करनेवाले अन्न के द्वारा हमारे अंगों को (दधुः) = धारण करते हैं । [परु:- अन्न ज्य०, परुः=limb]। (बृहस्पते) = हे ज्ञान के स्वामिन् प्रभो! आप (आयुषः) = जीवन के (प्रतरीता असि) = दीर्घ करनेवाले हैं। प्रभु हमारी वृत्ति को ऐसा बनाते हैं कि हम शरीर में शक्ति को धारण करनेवाले बनें और मन में स्तवन की वृत्ति को । इस प्रकार शरीर में व्याधियों से हम आक्रान्त नहीं होते तथा मन में आधियों के आक्रमण से बचे रहते हैं । यही दीर्घजीवन का मार्ग है। [२] वे प्रभु (यज्ञः) = पूजा के योग्य हैं, हमें सब कुछ देनेवाले हैं। (मनुः) = ज्ञान-विज्ञान के पुञ्ज हैं। (प्रमतिः) = हमें प्रकृष्ट बुद्धि के देनेवाले हैं । (नः पिता) = हमारे रक्षक हैं, (हि कम्) = निश्चय से सुखस्वरूप हैं । इनसे हम (अदितिम्) = उस स्वास्थ्य का (आवृणीमहे) = सर्वथा वरण करते हैं जो (सर्वतातिम्) = सब गुणों का विस्तार करनेवाला है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु हमारा धारण करते हैं, हमारे मनों में स्तवन की वृत्ति को तथा शरीर में शक्ति को प्राप्त कराते हैं। इस प्रकार हमारे दीर्घायुष्य को सिद्ध करते हैं ।