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ते अ॒स्मभ्यं॒ शर्म॑ यंसन्न॒मृता॒ मर्त्ये॑भ्यः। बाध॑माना॒ अप॒ द्विषः॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

te asmabhyaṁ śarma yaṁsann amṛtā martyebhyaḥ | bādhamānā apa dviṣaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ते। अ॒स्मभ्यम्। शर्म॑। यं॒स॒न्। अ॒मृताः॑। मर्त्ये॑भ्यः। बाध॑मानाः। अप॑। द्विषः॑ ॥

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ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:90» मन्त्र:3 | अष्टक:1» अध्याय:6» वर्ग:17» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:14» मन्त्र:3


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वे कैसे हों और क्या करें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - जो (द्विषः) दुष्टों को (अप बाधमानाः) दुर्गति के साथ निवारण करते हुए (अमृताः) जीवन्मुक्त विद्वान् हैं (ते) वे (मर्त्येभ्यः) (अस्मभ्यम्) अस्मदादि मनुष्यों के लिये (शर्म) सुख (यंसन्) देवें ॥ ३ ॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को चाहिये कि विद्वानों से शिक्षा को पाकर खोटे स्वभाववालों को दूर कर नित्य आनन्दित हों ॥ ३ ॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

निर्द्वेषता व कल्याण

पदार्थान्वयभाषाः - १. (ते) = वे "वरुण, मित्र व अर्यमा" के उपासक (अमृताः) = संसार के विषयों के पीछे न मरनेवाले देवपुरुष (अस्मभ्यम्) = हम (मर्त्येभ्यः) = वासनाओं से आक्रान्त होनेवाले पुरुषों के लिए (शर्म यंसन्) = कल्याण प्राप्त कराएँ । २. अपने जीवन के उदाहरण से तथा ज्ञान देकर वे (द्विषः) = द्वेष की भावनाओं को (अपबाधमानाः) = हमसे परे खदेड़नेवाले हों । वस्तुतः द्वेष की भावना ही सब प्रकार की अशान्तियों का कारण होती है । द्वेष से ऊपर उठा हुआ पुरुष ही शान्ति प्राप्त करता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ = 'वरुण, मित्र व अर्यमा' की वृत्तिवाले लोग सब द्वेषों से ऊपर उठकर औरों को भी द्वेष से ऊपर उठाते हुए शान्ति प्राप्त करनेवाले होते हैं ।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्ते कीदृशाः किं कुर्य्युरित्युपदिश्यते ॥

अन्वय:

ये द्विषोऽपबाधमाना अमृता विद्वांसः सन्ति ते मर्त्येभ्योऽस्मभ्यं शर्म यंसन् प्रापयन्तु ॥ ३ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (ते) विद्वांसः (अस्मभ्यम्) (शर्म्म) सुखम् (यंसन्) यच्छन्तु ददतु (अमृताः) जीवन्मुक्ताः (मर्त्येभ्यः) मनुष्येभ्यः (बाधमानाः) निवारयन्तः (अप) दूरीकरणे (द्विषः) दुष्टान् ॥ ३ ॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यैर्विद्वद्भ्यः शिक्षां प्राप्य दुष्टस्वभावान्निवार्य्य नित्यमानन्दितव्यम् ॥ ३ ॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - May they, lords of power and intelligence, immortal and free, bring us, for all the mortals, comfort and well-being, keeping off hate and enmity.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How should they be and what should they do is taught in the third Mantra.

अन्वय:

May those learned persons who are immortal by nature and liberated in life, bestow upon us mortals happiness, destroying all evils and feelings of animosity.

पदार्थान्वयभाषाः - (यंसन्) यच्छन्तु ददतु = bestow or give. (अमृताः) जीवनमुक्ताः = Liberated in life.
भावार्थभाषाः - Men should always enjoy bliss by receiving education from learned persons and casting aside all evil habits.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - माणसांनी विद्वानांकडून शिक्षण घेऊन दुष्ट स्वभावाच्या माणसांना दूर करून सदैव आनंदात राहावे. ॥ ३ ॥