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प्रा॒त॒र्याव्णः॑ सहस्कृत सोम॒पेया॑य सन्त्य । इ॒हाद्य दैव्यं॒ जनं॑ ब॒र्हिरा सा॑दया वसो ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

prātaryāvṇaḥ sahaskṛta somapeyāya santya | ihādya daivyaṁ janam barhir ā sādayā vaso ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्रा॒तः॒याव्नः॑ । स॒हः॒कृ॒त॒ । सो॒म॒पेया॑य । स॒न्त्य॒ । इ॒ह । अ॒द्य । दैव्य॑म् । जन॑म् । ब॒र्हिः । आ । सा॒द॒य॒ । व॒सो॒ इति॑॥

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ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:45» मन्त्र:9 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:32» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:9» मन्त्र:9


स्वामी दयानन्द सरस्वती

इसके अनुष्ठान करनेवाला मनुष्य किसके लिये क्या करे, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (सहस्कृत) सबको सिद्ध करने (सन्त्य) जो संभजनीय क्रियाओं में कुशल विद्वानों में सज्जन (वसो) श्रेष्ठ गुणों में वसनेवाले विद्वान् ! तू (इह) इस विद्या व्यवहार में (अद्य) आज (सोमपेयाय) सोम रस के पीने के लिये (प्रातर्याव्णः) प्रातःकाल पुरुषार्थ को प्राप्त होनेवाले विद्वानों और (दैव्यम्) विद्वानों में कुशल (जनम्) पुरुषार्थ युक्त धार्मिक मनुष्य और (बर्हिः) उत्तम आसन को (आसादय) प्राप्त कर ॥९॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य उत्तम गुण युक्त मनुष्यों ही को उत्तम वस्तु देते हैं ऐसे मनुष्यों ही का संग सब लोग करें कोई भी मनुष्य विद्या वा पुरुषार्थ युक्त मनुष्यों के संग वा उपदेश के विना पवित्र गुण वस्तुओं और सुखों को प्राप्त नहीं हो सकता ॥९॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सोमपान से सहस् की उत्पत्ति

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (सहस्कृत) - सहस् के द्वारा उत्पन्न, अर्थात् जिन आपका प्रादुर्भाव हमारे हृदयों में तभी होता है जबकि हम 'सहस्' वाले बनते हैं । आनन्दमयकोश की शक्ति का नाम ही "सहस्" है ; प्रभु का दर्शन 'सहस्' से ही होता है । निर्बल व चिड़चिड़े पुरुष को प्रभु का प्रकाश प्राप्त नहीं होता । हे (सन्त्य) - उत्तमोत्तम साधनभूत वस्तुओं के प्राप्त करानेवाले प्रभो ! आप (इह) - इस मानव - जीवन में (अद्य) - आज और अब (सोमपेयाय) - सोम का पालन करने के लिए, सोम को शरीर में ही सुरक्षित रखने के लिए (दैव्यं जनम्) - देववृत्तिवाले पुरुषों को (बहिः) - यज्ञों में (आसादय) - प्राप्त कराइए । वस्तुतः यज्ञों में लगे रहना ही वह उपाय है जोकि मनुष्यों को वासनाओं का शिकार नहीं होने देता और इस प्रकार उसे सोम का रक्षण करने के योग्य बनाता है । हे (वसो) - हमारे निवास को उत्तम बनानेवाले प्रभो ! आप (प्रातर्याव्णः) - प्रातः से ही कर्मों में लगनेवाले इन लोगों को (बर्हिः आसादय) - यज्ञों में प्राप्त कराइए । यह कहा जा चुका है कि सोमरक्षण के लिए कर्मशीलता, यज्ञादि उत्तम कर्मों में लगे रहना आवश्यक है । उसी बात पर बल देने के लिए 'प्रातर्याव्णः' शब्द का प्रयोग है - प्रातः से ही कर्मों में व्याप्त हो जाना कर्मों में लग जाना, इसलिए नितान्त आवश्यक है कि जरा खाली हुए और वासनाओं का आक्रमण हुआ । साथ ही प्रातः जागरण भी आवश्यक है । वेद में अन्यत्र कहा गया है कि प्रातः सोये हुओं के तेज को सूर्य अपहत कर लेता है । ३. 'प्रातः उठना व यज्ञादि कर्मों में लगे रहना' ही मनुष्य को 'सोमपान' करनेवाला बनाता है । सोमपान से शक्ति व सहस् उत्पन्न होता है । इस सहस् की उत्पत्ति से हमें प्रभुदर्शन होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम प्रातः उठें, कार्यों में लगे रहें [समारम्भ ही हमारा ध्येय हो] । सोम रक्षण द्वारा सहस् वाले बनें । हमारे हृदयों में प्रभु का प्रकाश होगा ।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

(प्रातर्याव्णः) ये प्रातः प्रतिदिनं यान्ति पुरुषार्थं गच्छन्ति तान् (सहस्कृत) सहो बलं कृतं येन तत्सम्बुद्धौ (सोमपेयाय) यः सोमो रसश्च पेयः पातुं योग्यश्च तैस्मै (संत्य) सनन्ति सम्भजन्ति ये ते सन्तस्तेषु साधो (इह) अस्मिन् विद्याव्यवहारे (अद्य) अस्मिन् दिने (दैव्यम्) देवेषु विद्वत्सु कुशलम् (जनम्) पुरुषार्थयुक्तं धार्मिकं विपश्चितम् (बर्हिः) उत्तमासनम् (आ) समन्तात् (सादय) आसय। अत्र अन्येषामपि० इति दीर्घः। (वसो) यः श्रेष्ठेषु गुणेषु वसति तत्संबुद्धौ ॥९॥

अन्वय:

एतदनुष्ठाता मनुष्यः कस्मै किं कुर्यादित्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे सहस्कृत सन्त्य वसो विद्वँस्त्वमिहाद्य सोमपेयाय प्रातर्याव्णो दैव्यं जनं बर्हिश्चासादय ॥९॥
भावार्थभाषाः - ये मनुष्या उत्तमगुणेभ्यो मनुष्येभ्य एवोत्तमानि वस्तूनि ददति तादृशानां सङ्गः सर्वैः कार्य्यः न हि कश्चिदपि विद्यापुरुषार्थयुक्तानां संगोपदेशाभ्यां विना दिव्यानि सुखानि प्राप्तुमर्हति ॥९॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Noble genius of light and knowledge, Agni, generous creator of strength, courage and endurance, holy shelter for the seekers, here and now institute the yajna and seat the lovers of divinity and morning pilgrims of yajna on the sacred grass to join the yajna for a drink of soma.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The same subject is continued.

अन्वय:

O mighty, bounteous good learned person dwelling in noble qualities, here place on high seat (in this dealing or work of diffusing knowledge) persons who go to work in the morning and industrious, righteous, divine, experts among the educated for drinking Soma (the strengthening juice of the herbs and plants.)

पदार्थान्वयभाषाः - [वसो] यः श्रेष्ठेषु गुणेषु वसति तत्सम्बुद्धौ = Dwelling in noble qualities. [ देव्यम् ] देवेषु विद्वत्सु कुशलम् = An expert among the learned.
भावार्थभाषाः - Men should associate themselves only with those who give good things in charity to virtuous persons. None can enjoy divine happiness without the association and instructions of the persons endowed with knowledge and exertion.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जी माणसे उत्तम गुणयुक्त माणसांनाच उत्तम वस्तू देतात अशा माणसांचा संग सर्व लोकांनी करावा. कोणताही माणूस विद्या किंवा पुरुषार्थयुक्त माणसांचा संग किंवा उपदेश याशिवाय पवित्र गुण, पवित्र वस्तू व शुद्ध सुख प्राप्त करू शकत नाही. ॥ ९ ॥