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त्वां चि॑त्रश्रवस्तम॒ हव॑न्ते वि॒क्षु ज॒न्तवः॑ । शो॒चिष्के॑शं पुरुप्रि॒याग्ने॑ ह॒व्याय॒ वोळ्ह॑वे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tvāṁ citraśravastama havante vikṣu jantavaḥ | śociṣkeśam purupriyāgne havyāya voḻhave ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

त्वाम् । चि॒त्र॒श्र॒वः॒त॒म॒ । हव॑न्ते । वि॒क्षु । ज॒न्तवः॑ । शो॒चिःके॑शम् । पु॒रु॒प्रि॒य॒ । अग्ने॑ । ह॒व्याय॑ । वोळ्ह॑वे॥

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ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:45» मन्त्र:6 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:32» मन्त्र:1 | मण्डल:1» अनुवाक:9» मन्त्र:6


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसको किस प्रकार ग्रहण करें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (चित्रश्रवस्तम) अत्यन्त अद्भुत अन्न वा श्रवणों से व्युत्पन्न (पुरुप्रिय) बहुतों को तृप्त करनेवाले (अग्ने) बिजुली के तुल्य विद्याओं में व्यापक विद्वान् ! जो (जन्तवः) प्राणी लोग (विक्षु) प्रजाओं में (वोढवे) विद्या प्राप्ति कराने हारे (हव्याय) ग्रहण करने योग्य पठन पाठनरूप यज्ञ के लिये जिस (शोचिष्केशम्) जिसके पवित्र आचरण हैं उस (त्वाम्) आपको (हवन्ते) ग्रहण करते हैं, वह आप उनको विद्या और शिक्षा देकर विद्वान् और शील युक्त शीघ्र कीजिये ॥६॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को उचित हैं कि अनेक गुणयुक्त अग्नि के समान विद्वान् को प्राप्त होके विद्याओं का ग्रहण करें ॥६॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

चित्रश्रवस्तम अग्नि

पदार्थान्वयभाषाः - १. 'श्रवस्' शब्द के यश [Glory] , धन [Wealth] , स्तोत्र [A hymn] व प्रशस्त कर्म [Praise and worthy action] ये अर्थ हैं । हे (चित्रश्रवस्तम) - अद्भुत व अतिशयित [अत्यन्त] यश, धन, स्तोत्र व प्रशस्त कर्मोंवाले प्रभो ! (पुरुप्रिय) - पालक - पूरक व प्रीणयिता प्रभो ! (अग्ने) - सब अग्रगतियों के साधक प्रभो ! (विक्षु त्वाम्) - सब प्राणियों में निवास करनेवाले आपको, जो आप (शोचिष्केशम्) - देदीप्यमान ज्ञानरश्मियोंवाले हैं, उन आपको (जन्तवः) - संसार में जन्म लेनेवाले लोग (हव्याय वोळ्हवे) - हव्य - उत्तम पदार्थों को प्राप्त कराने के लिए (हवन्ते) - पुकारते हैं ।  २. प्रभु सचमुच अद्भुत यशवाले हैं, उनकी महिमा का पूर्ण गायन किसी के लिए भी सम्भव नहीं । वे अनन्त धनवाले हैं, सब धनों को प्राप्त करानेवाले वे ही हैं । वेदवाणियों में उनके अद्भुत स्तोत्रों का प्रतिपादन हुआ है, उनकी कृतियाँ सचमुच अत्यन्त प्रशस्त हैं । देदीप्यमान ज्ञानरश्मियोंवाले वे प्रभु "शोचिष्केश" हैं ।  ३. वे प्रभु हमें शरीर देते हैं । इस शरीर में वे प्रभु भी अनुप्रविष्ट हो रहे हैं । सब प्रजाओं में उनका निवास है 'तत्सृष्ट्वा तदेवानु प्राविशन्' ।  ४. ये प्रभु ही जीवों को सब हव्य पदार्थ प्राप्त कराते हैं । इन पदार्थों को प्राप्त कराके वे हमारा 'पालन, पूरण व प्रीणन' कर रहे हैं ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम उस चित्रश्रवस्तम, शोचिष्केश, पुरुप्रिय - अग्नि' का आराधन करें । वे ही हमें सब हव्यपदार्थ प्राप्त कराते हैं ।   

स्वामी दयानन्द सरस्वती

(त्वाम्) (चित्रश्रवस्तम्) चित्राण्यद्भुतानि श्रवांस्यतिशयितान्यन्नादीनि यस्य तत्सम्बुद्धौ (हवन्ते) स्पर्द्धन्ते (विक्षु) प्रजासु (जन्तवः) मनुष्याः। जन्तव इति मनुष्यना०। निघं० २।३। (शोचिष्केशम्) शोचिषः शुद्धाचाराः केशाः प्रकाशका यस्य तम् (पुरुप्रिय) यः पुरून् बहून् प्रीणाति तत्सम्बुद्धौ (अग्ने) विद्वन् (हव्याय) होतुमर्हाय यज्ञाय (वोढवे) विद्याप्रापणाय ॥६॥

अन्वय:

पुनस्तं कीदृशं गृह्णीयुरित्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे चित्रश्रवसस्तम पुरुप्रियाग्ने विद्युदिव विद्वन् ! ये जन्तवो विक्ष वोढवे हव्याय यं शोचिष्केशं त्वां हवन्ते स त्वं तान् विद्यासुशिक्षाप्रदानेन विदुषः सुशीलान् सद्यः संपादय ॥६॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यैरनेकगुणाग्निवद्वर्त्तमानं विद्वांसं प्राप्य विद्याः सततं ग्राह्याः ॥६॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, lordly power of light and knowledge, most wondrous in fame and prosperity, flaming with flashes of lightning, widely loved and pursued, earnest men among people invoke, study and serve you for generous gifts of knowledge and power.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

अन्वय:

O learned person shining like lightning, loved by many and having food and fame most wondrous, when men call on you from all sides for performing the Yajna and for the attainment of knowledge, you should also make them learned and cultured (good-natured) by giving them wisdom aua good education.

पदार्थान्वयभाषाः - (चित्रश्रवस्तमम् ) चित्राणि-अद्भुतानि श्रणांसि-अतिशयितानि अनादीनि यस्य तत्सम्बुद्धौ (आदिपदेन यशोज्ञानादि ग्रहणम् ) = Having wonderful food and fame etc. (शोचिष्केशम्) शोचिष:-शुद्धाचारा: केशा: प्रकाशका यस्य तत्सम्बुद्धौ ( गोढवे) विद्याप्रापणाय = For the attainment and conveying of knowledge. ठाह-प्रापणे
भावार्थभाषाः - Men should acquire the knowledge of various sciences by sitting at the feet of a learned person who is like the fire endowed with many attributes.
टिप्पणी: शोचिष्केशम् has been interpreted by Rishi Dayananda as शोचिष: शुद्धाचाराः केशाः प्रकाशका यस्य शुचिरं पूतीभावे केशा रश्मयः काशनाद्वा प्रकाशनाद् वा इति यास्काचार्या निरुक्ते १२.२५ Rishi Dayananda's interpretation is therefore based upon the authority of the Nirukta and is not arbitrary.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - माणसांनी अनेक गुणांनी युक्त अग्नीप्रमाणे विद्वान बनून विद्या ग्रहण करावी. ॥ ६ ॥