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स्त॒वि॒ष्यामि॒ त्वाम॒हं विश्व॑स्यामृत भोजन । अग्ने॑ त्रा॒तार॑म॒मृतं॑ मियेध्य॒ यजि॑ष्ठं हव्यवाहन ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

staviṣyāmi tvām ahaṁ viśvasyāmṛta bhojana | agne trātāram amṛtam miyedhya yajiṣṭhaṁ havyavāhana ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

स्त॒वि॒ष्यामि॑ । त्वाम् । अ॒हम् । विश्व॑स्य । अ॒मृ॒त॒ । भो॒ज॒न॒ । अग्ने॑ । त्रा॒तार॑म् । अ॒मृत॑म् । मि॒ये॒ध्य॒ । यजि॑ष्ठम् । ह॒व्य॒वा॒ह॒न॒॥

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ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:44» मन्त्र:5 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:28» मन्त्र:5 | मण्डल:1» अनुवाक:9» मन्त्र:5


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर कैसे को ग्रहण करें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - (अमृत) अविनाशिस्वरूप (भोजन) पालनकर्त्ता (मियेध्य) प्रमाण करने (हव्यवाहन) लेने देने योग्य पदार्थों को प्राप्त करानेवाले (अग्ने) परमेश्वर (अहम्) मैं (विश्वस्य) सब जगत् के (त्रातारम्) रक्षा (यजिष्ठम्) अत्यन्त यजन करनेवाले (अमृतम्) नित्य स्वरूप (त्वा) तुझ ही की (स्तविष्यामि) स्तुति करूंगा ॥५॥
भावार्थभाषाः - विद्वानों को योग्य है कि इस सब जगत् के रक्षक मोक्ष देने, विद्या काम आनन्द के देने वा वा उपासना करने योग्य परमेश्वर को छोड़ अन्य किसी का भी ईश्वरभाव से आश्रय न करें ॥५॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु - स्तवन का निश्चय

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (अमृत) - कभी भी नष्ट न होनेवाले ! (अग्ने) - अग्रस्थान को प्राप्त करानेवाले ! (विश्वस्य भोजन) - [भुज पालने] सबके पालन करनेवाले ! (मियेध्य) - [मेध्य] संगतिकरण योग्य व उपास्य ! (हव्यवाहन) - हव्य पदार्थों को प्राप्त करानेवाले प्रभो ! (अहम्) - मैं (त्वाम्) - आपका ही (स्तविष्यामि) - स्तवन करूंगा ।  २. आप (त्रातारम्) - सबके रक्षक हैं, रोगादि से बचानेवाले हैं, (अमृतम्) - वासनाओं के कारण हमें कभी भी विषयों के पीछे न मरने देनेवाले हैं, (यजिष्ठम्) - सर्वाधिक पूज्य, संगतिकरण के योग्य व आवश्यक वस्तुओं के देनेवाले हैं [यज - देवपूजा - संगतिकरण - दान] ।  ३. प्रभुस्तवन से हम बहुत - कुछ प्रभु के अनुरूप बनते हैं, हमारे सामने एक लक्ष्यदृष्टि पैदा होती है और उसकी ओर बढ़ते हुए हम विषयों की चमक से आकृष्ट होकर बीच में ही रुक नहीं जाते ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हमें प्रभु की उपासना करते हुए प्रभु - जैसा बनने का प्रयत्न करना चाहिए ।   

स्वामी दयानन्द सरस्वती

(स्तविष्यामि) स्तोष्यामि (त्वाम्) जगदीश्वरम् (अहम्) (विश्वस्य) समस्तस्य संसारस्य (अमृत) अविनाशिन् (भोजन) पालक (अग्ने) स्वप्रकाशेश्वर (त्रातारम्) अभिरक्षितारम् (अमृतम्) नाशरहितं सदा मुक्तम् (भियेध्य) दुःखानां प्रक्षेप्तः (यजिष्ठम्) सुखानामतिशयितं दातारम् (हव्यवाहन) यो हव्यानि होतुं दातुमर्हाणि द्रव्याणि सुखसाधकानि वहति प्रापयति तत्सम्बुद्धौ ॥५॥

अन्वय:

पुनस्तं कीदृशं स्वीकुर्य्युरित्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे अमृत भोजन मियेध्य हव्यवाहनाऽग्ने ! जगदीश्वराऽहं विश्वस्य त्रातारं यजिष्ठममृतं त्वां स्तविष्यामि स्तोष्यामि नान्यं कदाचित् ॥५॥
भावार्थभाषाः - नहि विद्वद्भिरस्य सर्वस्य रक्षकं मोक्षदातारं विद्याकामानन्दप्रदं सेवनीयं परमेश्वरं हित्वा कस्यापीश्वरत्वेनाऽऽश्रयः स्तुतिर्वा कदापि कर्त्तव्या ॥५॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, self-refulgent lord of creation, eternal and imperishable, sustainer of the universe, holiest of the holy and giver of highest gifts of yajna, I shall ever sing in celebration of your glory as the eternal saviour and protector of the world and the worthiest object of worship in yajna.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The same subject is continued.

अन्वय:

O God Immortal, Nourisher of the universe, Destroyer of all miseries, or bringer of all happiness, I will always glorify Thee the Protector of the world, the Best Giver of all joys and Deathless and none else.

पदार्थान्वयभाषाः - (भोजन) पालक = Nourisher or Sustainer. (भुज-पालनाभ्यवहारयोः) Tr. (मियेध्य) दुःखानां प्रक्षेप्तः डुमिञ्-प्रक्षेपणे = Thrower or Destroyer of all miseries.
भावार्थभाषाः - Learned persons should never glorify and take shelter in any one as God except the Lord who is the Preserver of the world, the Giver of emancipation, Giver of Knowledge, fulfiller of noble desires and bliss and worthy of worship or adoration.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - विद्वानांनी या जगाचा रक्षक, मोक्षदायक, विद्या, कामना आनंद यांचा दाता, उपासना करण्यायोग्य परमेश्वराला सोडून इतर कुणाचाही ईश्वर समजून आश्रय घेऊ नये. ॥ ५ ॥