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ऊ॒र्ध्व ऊ॒ षु ण॑ ऊ॒तये॒ तिष्ठा॑ दे॒वो न स॑वि॒ता । ऊ॒र्ध्वो वाज॑स्य॒ सनि॑ता॒ यद॒ञ्जिभि॑र्वा॒घद्भि॑र्वि॒ह्वया॑महे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ūrdhva ū ṣu ṇa ūtaye tiṣṭhā devo na savitā | ūrdhvo vājasya sanitā yad añjibhir vāghadbhir vihvayāmahe ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ऊ॒र्ध्वः । ऊँ॒ इति॑ । सु । नः॒ । ऊ॒तये॑ । तिष्ठ॑ । दे॒वः । न । स॒वि॒ता । ऊ॒र्ध्वः । वाज॑स्य । सनि॑ता । यत् । अ॒ञ्जिभिः॑ । वा॒घत्भिः॑ । वि॒ह्वया॑महे॥

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ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:36» मन्त्र:13 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:10» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:8» मन्त्र:13


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह सभाध्यक्ष कैसा होता है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे सभापते ! आप (देवः) सबको प्रकाशित करने हारे (सविता) सूर्य लोक के (न) समान (नः) हम लोगों की रक्षा आदि के लिये (ऊर्ध्वः) ऊंचे आसन पर (सुतिष्ठ) सुशोभित हूजिये (उ) और (ऊर्ध्वः) उन्नति को प्राप्त हुए (वाजस्य) युद्ध के (सविता) सेवनेवाले हूजिये इस लिये हम लोग (अञ्जिभिः) यज्ञ के साधनों को प्रसिद्ध करने तथा (वाद्यद्भिः) सब ऋतुओं में यज्ञ करनेवाले विद्वानों के साथ (विह्वयामहे) विविधप्रकार के शब्दों से आपकी स्तुति करते हैं ॥१३॥
भावार्थभाषाः - सूर्य्य के समान अतितेजस्वी सभापति को चाहिये कि संग्राम सेवन से दुष्ट शत्रुओं को हटा के सब प्राणियों की रक्षा के लिये प्रसिद्ध विद्वानों के साथ सभा के बीच में ऊंचे आसन पर बैठे ॥१३॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

रक्षण व शक्ति - लाभ

पदार्थान्वयभाषाः - १. (नः) - हमारी (स ऊतये) - उत्तम रक्षा के लिए (उ) - निश्चय से हे प्रभो ! (ऊर्ध्वः तिष्ठ) - आप उसी प्रकार ऊपर उठकर ठहरे हुए हैं, अर्थात् किसी भी प्रकार का प्रमाद न करते हुए आप हमारा रक्षण कर रहे हैं (न) - जैसेकि (सविता देवः) - यह सूर्यदेव हमारा रक्षण करता है । वस्तुतः इन सूर्यादि देवों की उस - उस शक्ति व क्रिया से प्रभु ही तो हमारा रक्षण कर रहे हैं । इन सूर्यादि देवों में देवत्व की स्थापना प्रभु ही कर रहे हैं ।  २. हे प्रभो ! आपके द्वारा होनेवाले रक्षण का प्रकार यह है कि आप (ऊर्ध्वः) - सदा उद्यत हुए (वाजस्य सनिता) - हमें ज्ञान व शक्ति देनेवाले हैं । इस ज्ञान व शक्ति के प्रदान से आप हमें रक्षण की योग्यता प्राप्त करा रहे हैं ।  ३. परन्तु यह सब होता तभी है (यद्) - जबकि हम (अञ्जिभिः) - सब विज्ञानों को व्याप्त करनेवाले (वाघद्भिः) - ऋतु - ऋतु में यज्ञों के करनेवाले ज्ञानी ऋत्विजों के साथ (विह्वयामहे) - विशेषरूप से स्पर्धा करनेवाले होते हैं, अर्थात् उनके सम्पर्क में आकर अपने अन्दर ज्ञान व यज्ञ की वृत्ति को बढ़ाने के लिए यत्नशील होते हैं । वस्तुतः जब मनुष्य सत्सङ्ग के द्वारा अपने ज्ञान व यज्ञवृत्ति को बढ़ाने का प्रयत्न करता है, तब वह अपने को प्रभु की रक्षा का पात्र बना लेता है और प्रभु उसे शक्ति प्राप्त कराते हैं ताकि वह उन्नति - पथ पर निरन्तर आगे बढ़ सके ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु हमारे रक्षक हैं, शक्ति के देनेवाले हैं । हमें चाहिए कि ज्ञानी व यज्ञशील पुरुषों के सम्पर्क में आकर अपने को प्रभु - रक्षा का पात्र बनाएँ ।   

स्वामी दयानन्द सरस्वती

(ऊर्ध्वः) उच्चासने (ऊँ) च (सु) शोभने। अत्र सोरुपसर्गस्य ग्रहणं न किंतु सुञो निपातस्य तेन इकः सुञि। अ० ६।३।१३४। इतिसंहितायामुकारस्यदीर्घः। सुञः। ८।३।१०७। इतिमूर्द्धन्यादेशश्च। (नः) अस्माकम्। नश्चधातुस्थोरुषुभ्यः अ० ८।४।२६। इति णत्वम्। (ऊतये) रक्षणाद्याय (तिष्ठ) अत्र द्वचोतस्तिङ इतिदीर्घश्च। (देवः) द्योतकः (न) इव (सविता) सूर्यलोकः (ऊर्ध्वः) उन्नतस्सन् (वाजस्य) संग्रामस्य (सनिता) संभक्ता सेवकः (यत्) यस्मात् (अंजिभिः) अञ्जसाधनानिप्रकटयद्भिः। सर्वधातुभ्य इन्। उ० ४।१२३। इति कर्त्तरीन् प्रत्ययः। (वाद्यद्भिः) विद्वद्भिर्मेधाविभिः वाद्यत इति मेधाविनामसु पठितम्। निघं० ३।१५। (विह्वयामहे) विविधैः शब्दैः स्तुमः ॥१३॥

अन्वय:

पुनः स कथंभूत इत्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे सभापते त्वं सविता देवो नेव नोऽस्माकमूतय ऊर्ध्वः सुतिष्ठ। उ चोर्ध्वः सन् वाजस्य सनिता भवातो वयमंजिभिर्वाद्यद्भिस्सह त्वां विह्वयामहे ॥१३॥
भावार्थभाषाः - सूर्य्यवदुत्कृष्टतेजसा सभापतिना संग्रामसेवने न दुष्टशत्रून्निवार्य्य सर्वेषां प्राणिनामूतये यज्ञसाधकैर्विद्वद्भिः सहात्युच्चासने स्थातव्यम् ॥१३॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, lord of light and life, brilliant as the sun, stay high with grace in glory for our protection and progress. Rise high as the hero of life’s battles of honour and prosperity. It is for the reason of your glory and generosity that we invoke and pray to you alongwith the scholars with holy offers of yajna and celebration.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How is he ( Agni ) is taught further.

अन्वय:

O President of the Assembly, stand up erect for our protection like the sun. Being exalted, be the giver of light, be the giver of strength and food to us waging war against unrighteous persons. Therefore with the help of the wise who instruct us about the means, we call on and praise you.

पदार्थान्वयभाषाः - [वाजस्य] संग्रामस्य = Of the battle. [[अंजिभि:] साधनानि प्रकाशयद्भिः = Manifesting or instructing about the means. अंजू - व्यक्तिम्रक्षणकान्तिगतिषु ( उणा० ४.१२३ ) सर्वधातुभ्यः इन् इति अंजूधातोः इन् प्रत्ययः ।
भावार्थभाषाः - A President of the Assembly should be full of splendour like the Sun. He should overcome all unrighteous and wicked enemies by waging war against them and should take his seat on a high pedestal along with the learned priests for the protection of all beings.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - सूर्याप्रमाणे अति तेजस्वी सभापतीने युद्ध करून दुष्ट शत्रूंना हरवून सर्व प्राण्यांचे रक्षण करण्यासाठी प्रसिद्ध विद्वानांबरोबर सभेत उच्च आसनावर बसावे. ॥ १३ ॥