परा॒ हि मे॒ विम॑न्यवः॒ पत॑न्ति॒ वस्य॑इष्टये। वयो॒ न व॑स॒तीरुप॑॥
parā hi me vimanyavaḥ patanti vasyaïṣṭaye | vayo na vasatīr upa ||
परा॑। हि। मे॒। विऽम॑न्यवः। पत॑न्ति। वस्यः॑ऽइष्टये। वयः॑। न। व॒स॒तीः। उप॑॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर भी उसी अर्थ को दृष्टान्त से अगले मन्त्र में सिद्ध किया है॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
उत्तम जीवन की प्राप्ति
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनः स एवार्थो दृष्टान्तेन साध्यते॥
हे जगदीश्वर ! त्वत्कृपया वयो वसतीर्विहाय दूरस्थानान्युपपतन्ति न इव। मे मम वासात् वस्यइष्टये विमन्यवः परा पतन्ति हि खलु दूरे गच्छन्तु॥४॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The same subject is continued, by giving an illustration.
O God, As birds flee to distant places having left off their nests, in the same manner, let persons given to anger may go away from my residence, in order to attain wealth.
