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परा॒ हि मे॒ विम॑न्यवः॒ पत॑न्ति॒ वस्य॑इष्टये। वयो॒ न व॑स॒तीरुप॑॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

parā hi me vimanyavaḥ patanti vasyaïṣṭaye | vayo na vasatīr upa ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

परा॑। हि। मे॒। विऽम॑न्यवः। पत॑न्ति। वस्यः॑ऽइष्टये। वयः॑। न। व॒स॒तीः। उप॑॥

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ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:25» मन्त्र:4 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:16» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:6» मन्त्र:4


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर भी उसी अर्थ को दृष्टान्त से अगले मन्त्र में सिद्ध किया है॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे जगदीश्वर ! जैसे (वयः) पक्षी (वसतीः) अपने रहने के स्थानों को छोड़-छोड़ दूर देश को (उपपतन्ति) उड़ जाते हैं (न) वैसे (मे) मेरे निवास स्थान से (वस्यइष्टये) अत्यन्त धन होने के लिये (विमन्यवः) अनेक प्रकार के क्रोध करनेवाले दुष्ट जन (परापतन्ति) (हि) दूर ही चले जावें॥४॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे उड़ाये हुए पक्षी दूर जाके बसते हैं, वैसे ही क्रोधी मुझ से दूर बसें और मैं भी उनसे दूर बसूँ, जिससे हमारा उलटा स्वभाव और धर्म की हानि कभी न होवे॥४॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

उत्तम जीवन की प्राप्ति

पदार्थान्वयभाषाः - १. गतमन्त्र के अनुसार जब मैं अपने मन को प्रभु के साथ बाँधता हूँ तब (मे) - मेरी (विमन्यवः) - क्रोध से रहित बुद्धियाँ (वस्यः) - अतिशयेन वसुमान् , अर्थात् उत्तम निवासक तत्त्वोंवाले जीवन की (इष्टये) - प्राप्ति के लिए (हि) - निश्चयपूर्वक (परापतन्ति) - विषयों से पराङ्मुख होकर आपकी ओर आती हैं ।  २. मेरी वृत्तियाँ उसी प्रकार हे वरुण! आपकी ओर आती हैं (न) - जैसे कि (वयः) - पक्षी (वसतीः उप) - अपने निवासस्थानों की ओर आते हैं । पक्षी थक - थकाकर अथवा किसी से भयभीत होकर घोंसले की ओर आता है , इसी प्रकार जीव में विषयों से एक श्रान्ति उत्पन्न हो जाती है , उनमें आनन्द के स्थान में अब क्षीणता के कारण निर्वेद उत्पन्न हो जाता है अथवा वह इन विषयों से भयभीत हो उठता है और उस समय उसकी वृत्तियाँ इन विषयों से पराङ्मुख होकर प्रभु की ओर दौड़ती हैं , उस समय ही मनुष्य को वास्तविक शान्ति प्राप्त होती है और उसका जीवन उत्तम बनता है । 
भावार्थभाषाः - भावार्थ - मेरी वृत्तियाँ विषय - पराङ्मुख होकर प्रभु की ओर चलें । इसी में जीवन की उत्तमता तथा सच्ची शान्ति है । 

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनः स एवार्थो दृष्टान्तेन साध्यते॥

अन्वय:

हे जगदीश्वर ! त्वत्कृपया वयो वसतीर्विहाय दूरस्थानान्युपपतन्ति न इव। मे मम वासात् वस्यइष्टये विमन्यवः परा पतन्ति हि खलु दूरे गच्छन्तु॥४॥

पदार्थान्वयभाषाः - (परा) उपरिभावे। प्र परेत्येतस्य प्रातिलोम्यं प्राह। (निरु०१.३) (हि) खलु (मे) मम (विमन्यवः) विविधो मन्युर्येषां ते (पतन्ति) पतन्तु गच्छन्तु। अत्र लोडर्थे लट्। (वस्यइष्टये) वसीयत इष्टये सङ्गतये। अत्र वसुशब्दान्मतुप् ततोऽतिशय ईयसुनि। विन्मतोर्लुक्। (अष्टा०५.३.६५) इति मतोर्लुक्। टेः। (अष्टा०६.४.१५५) इति टेर्लोपस्ततश्छान्दसो वर्णलोपो वा इतीकारस्य लोपश्च। (वयः) पक्षिणः (न) इव (वसतीः) वसन्ति यासु ता विहाय (उप) सामीप्ये॥४॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमालङ्कारः। यथा ताडिताः पक्षिणो दूरं गत्वा वसन्ति, तथैव क्रोधयुक्ताः प्राणिनो मत्तो दूरे वसन्त्वहमपि तेभ्यो दूरे वसेयम्। यस्मादस्माकं स्वभावविपर्यासो धनहानिश्च कदाचिन्न स्यातामिति॥४॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - For the sake of my domestic good and well being, I pray, may those who are ill-disposed and impassioned against me go off far away just as birds leave their nests and fly away.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The same subject is continued, by giving an illustration.

अन्वय:

O God, As birds flee to distant places having left off their nests, in the same manner, let persons given to anger may go away from my residence, in order to attain wealth.

पदार्थान्वयभाषाः - (विमन्यवः) विविधः मन्युर्येषां ते ॥ = Men of angry nature or hot temper. (वस्य इष्टये ) वसीयतः इष्टये - संगतये अत्र वसुशब्दान्मतृप ततोऽतिशय ईग्रसुनि विन्मतोर्लुक् (अष्टा० ५.३.६५ ) टे: अ० ६४-१५५ इति टेर्लोपः ततः छान्दसो वर्णलोपः वा इतीकारस्य लोपश्च ॥
भावार्थभाषाः - As birds when beaten (with stones), go away to distant places, in the same manner, let the persons indulging in anger, keep away from me and I keep away from them, so that let there be no change (for the worse) in our nature or habits and also loss of wealth.
टिप्पणी: मन्युरितिक्रोध नाम ( निघ० २.१३) हृष्टये is derived from यज-देव पूजा संगतिकरण दानेषु Hence Rishi Dayananda has taken it in the sense of 2nd meaning, and explained it as संगतये Swami Ananda Tirtha's translation though different from the above interpretation is significant from the spiritual point of view. पराक् पतन्ति मे प्रज्ञाः, विविधाः शुभलब्धये । पक्षिणां वसतीर्यद्वत, हा न त्वां प्राप्नुवन्ति च ॥ (ऋग्भाष्ये मध्वाचार्य कृते )

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमालंकार आहे. जसे उड्डाण केलेले पक्षी दूर जातात तसेच क्रोधी जीव माझ्यापासून दूर जावेत. मीही त्यांच्यापासून दूर जावे. ज्यामुळे आमचा स्वभाव विरोधी बनू नये व धनाची हानीही होऊ नये. ॥ ४ ॥