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विश्वा॑न्दे॒वान्ह॑वामहे म॒रुतः॒ सोम॑पीतये। उ॒ग्रा हि पृश्नि॑मातरः॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

viśvān devān havāmahe marutaḥ somapītaye | ugrā hi pṛśnimātaraḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

विश्वा॑न्। दे॒वान्। ह॒वा॒म॒हे॒। म॒रुतः॑। सोम॑ऽपीतये। उ॒ग्राः। हि। पृश्नि॑ऽमातरः॥

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ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:23» मन्त्र:10 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:9» मन्त्र:5 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:10


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वे किस प्रकार के हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-

पदार्थान्वयभाषाः - विद्या की इच्छा करनेवाले हम लोग (हि) जिस कारण से जो ज्ञान क्रिया के निमित्त से शिल्प व्यवहारों को प्राप्त करानेवाले (उग्राः) तीक्ष्णता वा श्रेष्ठ वेग के सहित और (पृश्निमातरः) जिनकी उत्पत्ति का निमित्त आकाश वा अन्तरिक्ष है, इससे उन (विश्वान्) सब (देवान्) दिव्यगुणों के सहित उत्तम गुणों के प्रकाश करानेवाले वायुओं को (हवामहे) उत्तम विद्या की सिद्धि के लिये जानना चाहते हैं॥१०॥
भावार्थभाषाः - जिससे यह वायु आकाश ही से उत्पन्न आकाश में आने-जाने और तेज स्वभाववाले हैं, इसी से विद्वान् लोग कार्य्य के अर्थ इनका स्वीकार करते हैं॥१०॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

तेजस्विता व ज्ञानदीप्ति

पदार्थान्वयभाषाः - १. हम अपने जीवनों में (सोमपीतये) - सोम के पान के लिए , अर्थात् शरीर में वीर्य की रक्षा के लिए (विश्वान् देवान्) - सब दिव्यगुणों को (हवामहे) - पुकारते हैं । राक्षसीभाव ही सोम के विनाशक होते हैं ।  २. इन देवों में हम विशेषकर (मरुतः) - मरुतों को (हवामहे) - पुकारते हैं । शरीर में प्राण ही मरुत हैं । इन प्राणों को पुकारने का अभिप्राय "प्राणों की साधना" से है । मैं नियमपूर्वक प्राणसाधना व प्राणायाम करता हूँ । यह प्राणसाधना मुझे ऊध्वरेतस् बनाती है ।  ३. इस ऊर्ध्वरेतस् बनने से मेरी शक्ति भी बढ़ती है और ज्ञान का प्रकाश भी , अतः मन्त्र में कहते हैं कि ये मरुत् (उग्राः) - तेजस्वी हैं तथा (हि) - निश्चय से (पृश्निमातरः) - उस हृदयान्तरिक्ष के निर्माण करनेवाले हैं जोकि 'संस्रष्टाभासं ज्योतिषाम्' [निरु० २/१५] विविध ज्ञानों की दीप्ति से युक्त है । 
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम दिव्यगुणों को धारण करें । विशेषतः प्राणसाधना अवश्य करें । इन प्राणों के सहाय्य से ही हम ऊर्ध्वरेतस् बनते हैं और इस प्रकार ये प्राण हमें तेजस्वी व विज्ञान - दीप्तिमय हृदय - अन्तरिक्षवाला बनाते हैं । 

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्ते कीदृशा इत्युपदिश्यते।

अन्वय:

हि यतो विद्यां चिकीर्षवो वयं य उग्राः पृश्निमातरः सन्ति, तस्मादेतान् विश्वान् देवान् मरुतो हवामहे॥१०॥

पदार्थान्वयभाषाः - (विश्वान्) सर्वान् (देवान्) दिव्यगुणसाहित्येनोत्तमगुणप्रकाशकान् (हवामहे) विद्यासिद्धये स्पर्द्धामहे। अत्र बहुलं छन्दसि इति सम्प्रसारणम्। (मरुतः) ज्ञानक्रियानिमित्तेन शिल्पव्यवहारप्रापकान्। मरुत इति पदनामसु पठितम्। (निघं०५.५) अनेन प्राप्त्यर्थो गृह्यते (सोमपीतये) पदार्थानां यथावद्भोगाय (उग्राः) तीव्रसंवेगादिगुणसहितः (हि) हेत्वर्थे (पृश्निमातरः) पृश्निराकाशमन्तरिक्षं मातोत्पत्तिनिमित्तं येषां ते। पृश्निरिति साधारणनामसु पठितम्। (निघं०१.४)॥१०॥
भावार्थभाषाः - यत एत आकाशादुत्पन्ना वायवो यत्र तत्र गमनागमनकर्त्तारस्तीक्ष्णस्वभावास्सन्त्यत एव विद्वांसः कार्य्यार्थं तान् स्वीकुर्वन्ति॥१०॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - We invoke all the divinities of nature and humanity, and we invoke the Maruts, fierce children of mother skies, all for a drink of soma — to celebrate our creation of power by yajna and join our prayer for protection by Grace.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How are they is taught in the tenth Mantra.

अन्वय:

We desirous of knowledge, invoke the Maruts (winds) which are fierce, rapid and powerful and which are born out of the firmament, helpful in the functions of arts and industries with the combination of knowledge and action, in order to enjoy all objects properly

पदार्थान्वयभाषाः - (मरुतः) ज्ञानक्रियानिमित्तेन शिल्पव्यवहारमापकान् । मरुत इति पदनामसु पठितम् ( निघ० ५.५ ) अनेन प्राप्त्यर्थो गृह्यते || = Winds which are helpful in the functions of arts, crafts and industries. (पृश्निमातरः) पृश्नि:-आकाशम् अन्तरिक्षं माता-उत्पत्ति निमित्तं येषां ते || = Having their origin in the firmament. (सोमपीतये) पदार्थानां यथावद् भोगाय = For the legitimate enjoyment of all articles. पृश्निरिति साधारणनामसु (निघ० १.४)
भावार्थभाषाः - Learned persons accept for various purposes, these winds which move from place to place and are of fierce and powerful nature born out of the sky.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - वायू आकाशात उत्पन्न होऊन आकाशात गमनागमन करतात, ते तेजस्वी स्वभावाचे असतात. त्यामुळेच विद्वान लोक कार्यासाठी त्यांचा स्वीकार करतात. ॥ १० ॥