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विश्र॑यन्तामृता॒वृधो॒ द्वारो॑ दे॒वीर॑स॒श्चतः॑। अ॒द्या नू॒नं च॒ यष्ट॑वे॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

vi śrayantām ṛtāvṛdho dvāro devīr asaścataḥ | adyā nūnaṁ ca yaṣṭave ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

वि। श्र॒य॒न्ता॒म्। ऋ॒त॒ऽवृधः॑। द्वारः॑। दे॒वीः। अ॒स॒श्चतः॑। अ॒द्य। नू॒नम्। च॒। यष्ट॑वे॥

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ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:13» मन्त्र:6 | अष्टक:1» अध्याय:1» वर्ग:24» मन्त्र:6 | मण्डल:1» अनुवाक:4» मन्त्र:6


स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब अगले मन्त्र में घर यज्ञशाला और विमान आदि रथ अनेक द्वारों के सहित बनाने चाहियें, इस विषय का उपदेश किया है-

पदार्थान्वयभाषाः - हे (मनीषिणः) बुद्धिमान् विद्वानो ! (अद्य) आज (यष्टवे) यज्ञ करने के लिये घर आदि के (असश्चतः) अलग-अलग (ऋतावृधः) सत्य सुख और जल के वृद्धि करनेवाले (देवीः) तथा प्रकाशित (द्वारः) दरवाजों का (नूनम्) निश्चय से (विश्रयन्ताम्) सेवन करो अर्थात् अच्छी रचना से उनको बनाओ॥६॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को अनेक प्रकार के द्वारों के घर, यज्ञशाला और विमान आदि यानों को बनाकर उनमें स्थिति होम और देशान्तरों में जाना-आना करना चाहिये॥६॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

ऋतावृथ् द्वार

पदार्थान्वयभाषाः - १. इस शरीररूप नगरी में इन्द्रियाँ ही द्वार है - "अष्टाचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या" यह शरीररूप देवनगरी आठ चक्रोंवाली व नौ द्वारोंवाली है । 'पुरमेकादशद्वारम्' यह शरीररूप पुर ११ द्वारोंवाला है - 'दो कान  , दो नासिका - छिद्र  , दो आँखें व मुख' ये सात द्वार हैं  , दो अधोद्वार [पायु व उपस्थ] मिलकर ये ९ हो जाते हैं  , नाभि व ब्रह्मरन्ध्र के मिलने पर इनकी संख्या ११ हो जाती है । ये (द्वारः) - इन्द्रिय - द्वार (विश्रयन्ताम्) - विशेषरूप से पुरुष का आश्रय करनेवाले हों । ये द्वार पुरुष में (ऋतावृधः) - ऋत का वर्धन करनेवाले हों  , अर्थात् एक - एक इन्द्रिय ठीक कार्य करनेवाली हो । ये द्वार (देवीः) - प्रकाशमय हों - [दिव् द्युति] । एक - एक ज्ञानेन्द्रिय अपने - अपने विषय का ठीक प्रकार से प्रकाश करे । (असश्चतः) - [सश्च  , to stick  , cling] ये इन्द्रिय - द्वार विषयों से चिपक न जाएँ । आसक्ति ही तो सब उन्नतियों व विकासों को समाप्त करनेवाली है ।  २. इस प्रकार ऋत का वर्धन करनेवाले - नियमितता से कार्यों को करनेवाले प्रकाशमय [देवीः] अनासक्त होकर विषयों में विचरनेवाले इन्द्रिय - द्वार इसलिए हमारा आश्रय व सेवन करें कि हम (अद्या) - आज से ही  , अभी से ही (नूनम्) - निश्चयपूर्वक (यष्टवे) - यज्ञ के लिए हों - हमारा जीवन यज्ञशील हो जाए ।  ३. इन्द्रियों के 'ऋतावृध्' होने का अभिप्राय यही तो है कि वे यज्ञ में प्रवृत्त हैं  , (असश्चतः) वे भोगों से निवृत्त हैं  , अतएव (देवीः) - प्रकाशमय हैं । ऐसे ही इन्द्रिय - द्वार हमारे जीवन को यज्ञमय बनाने में सहायक होते हैं । 
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हमारी इन्द्रियों 'ऋतावृध्' देवी तथा असश्चत्' हों  , ताकि हमारा जीवन अभी से यज्ञमय हो जाए ।  

स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथ गृहं यज्ञशाला यानानि चानेकद्वाराणि रचनीयानीत्युपदिश्यते।

अन्वय:

हे मनीषिणोऽद्य यष्टवे गृहादेरसश्चत ऋतावृधो देवीर्द्वारो नूनं विश्रयन्ताम्॥६॥

पदार्थान्वयभाषाः - (वि) विविधार्थे (श्रयन्ताम्) सेवन्ताम् (ऋतावृधः) या ऋतं सत्यं सुखं जलं वा वर्धयन्ति ताः। अत्र अन्येषामपि० इति दीर्घः। (द्वारः) द्वाराणि (देवीः) द्योतमानाः। अत्र वा च्छन्दसि इति जसः पूर्वसवर्णत्वम्। (असश्चतः) विभागं प्राप्ताः। अत्र सस्ज गतौ इत्यस्य व्यत्ययेन जकारस्य चकारः। (अद्य) अस्मिन्नहनि। अत्र निपातस्य च इति दीर्घः। (नूनम्) निश्चये (च) समुच्चये (यष्टवे) यष्टुम्। अत्र ‘यज’ धातोस्तवेन् प्रत्ययः॥६॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यैरनेकद्वाराणि गृहयज्ञशालायानानि रचयित्वा तत्र स्थितिं हवनं गमनागमने च कर्त्तव्ये॥६॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Scholars of science, servants of eternal truth who extend the bounds of knowledge, open the holy doors of inexhaustible light, the yajna must be performed to day.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The place of Yajna (Sacrificial hall) and vehicles should be made of many doors is taught in the 6th Mantra.

अन्वय:

O wise learned men, in order to make a Yajna (Non-violent sacrifice) let the shining doors which are augmenters of happiness and truth and which are properly designed be certainly set open, as to-day the Yajna is to be performed.

पदार्थान्वयभाषाः - (ऋतावृधः) या ऋतं सत्यं सुखं जलं वा वर्धयन्ति ताः अत्र अन्येषामपि दृश्यते । (अष्टा. ६.३.१३७) इति दीर्घः (असश्चतः) विभागं प्राप्तः । अत्र सम्ज-गतौ इत्यस्य व्यत्ययेन जकारस्य चकारः ।।
भावार्थभाषाः - Men should make houses, sacrificial halls and conveyances of many doors so that persons may dwell there, perform Yajna and go in and come out easily.
टिप्पणी: Rishi Dayananda has given three meanings of the term ऋतम्, सल्यं सुखं जलं .वेति ऋतमित्युदकनाम (निघ० १.१२ ) ऋतमिति सत्यनाम (निध. ३.१० ) ऋतमिति पदनाम पद-गतौ गतेस्त्रयोऽर्थाः ज्ञानं गमनं प्राप्तिश्च प्राप्यते मनीषिभिरिति ऋतं सुखम् On the authority of these quotations from the Vedic Lexicon Nighantu, it is quite clear that the meanings given by him are correct and authentic.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - माणसांनी अनेक दरवाजे असलेली घरे, यज्ञशाळा व विमाने इत्यादी याने तयार करावीत. त्यात राहून होम करावा व देशदेशान्तरी भ्रमण करावे. ॥ ६ ॥