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सीद॑ होतः॒ स्व उ॑ लो॒के चि॑कि॒त्वान्त्सा॒दया॑ य॒ज्ञं सु॑कृ॒तस्य॒ योनौ॑। दे॒वा॒वीर्दे॒वान्ह॒विषा॑ यजा॒स्यग्ने॑ बृ॒हद्यज॑माने॒ वयो॑ धाः॥

English Transliteration

sīda hotaḥ sva u loke cikitvān sādayā yajñaṁ sukṛtasya yonau | devāvīr devān haviṣā yajāsy agne bṛhad yajamāne vayo dhāḥ ||

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Pad Path

सीद॑। हो॒त॒रिति॑। स्वे। ऊँ॒ इति॑। लो॒के। चि॒कि॒त्वान्। सा॒दय॑। य॒ज्ञम्। सु॒ऽकृ॒तस्य॑। योनौ॑। दे॒व॒ऽअ॒वीः। दे॒वान्। ह॒विषा॑। य॒जा॒सि॒। अग्ने॑। बृ॒हत्। यज॑माने। वयः॑। धाः॒॥

Rigveda » Mandal:3» Sukta:29» Mantra:8 | Ashtak:3» Adhyay:1» Varga:33» Mantra:3 | Mandal:3» Anuvak:2» Mantra:8


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SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

Word-Meaning: - हे (होतः) सुख देनेवाले (अग्नि) अग्नि के सदृश तेजस्वी पुरुष ! आप (स्वे) अपने (लोके) दर्शन में (सीद) वर्त्तमान हो (चिकित्वान्) ज्ञानयुक्त होकर (सुकृतस्य) पुण्य कर्म के (योनौ) कारण वा स्थान में (यज्ञम्) धर्मसम्बन्धी व्यवहार को (सादय) स्थित करो (देवावीः) विद्वानों की रक्षाकर्त्ता (हविषा) दान से (देवान्) उत्तम गुण वा विद्वान् पुरुषों को (यज्ञासि) यज्ञ करें वा स्वीकार करें (उ) यह तर्क है कि (यजमाने) योग्य धर्मसम्बन्धी व्यवहार के कर्त्ता पुरुष में (बृहत्) बड़े (वयः) जीवन वा धर्म आदि को (धाः) धारण करें ॥८॥
Connotation: - जैसे अग्निहोत्र आदि वा शिल्प आदि सङ्गति के योग्य व्यवहार में संयुक्त किया गया अग्नि उत्तम गुणों को प्रकट करता है, वैसे ही विद्वान् पुरुष को चाहिये कि धर्मसम्बन्धी कर्मों से युक्त करके उत्तम सुखों को संसार में फैलावें ॥८॥
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SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनस्तमेव विषयमाह।

Anvay:

हे होतरग्नेऽग्निरिव त्वं स्वे लोके सीद चिकित्वान्त्सन् सुकृतस्य योनौ सादय देवावीः सन् हविषा देवान् यजास्यु यजमाने बृहद्वयो धाः ॥८॥

Word-Meaning: - (सीद) आस्व (होतः) सुखप्रदातः (स्वे) स्वकीये (उ) वितर्के (लोके) दर्शने (चिकित्वान्) ज्ञानवान् (सादय) स्थापय। अत्र संहितायामिति दीर्घः। (यज्ञम्) धर्म्यव्यवहारम् (सुकृतस्य) सुष्ठुनिष्पादितस्य (योनौ) कारणे गृहे वा (देवावीः) यो देवानवति सः (देवान्) दिव्यान् गुणान् विदुषो वा (हविषा) दानेन (यजासि) यजेः (अग्ने) पावकवद्वर्त्तमान (बृहत्) महत् (यजमाने) सङ्गतधर्म्यव्यवहारकर्त्तरि (वयः) जीवनं धनादिकं वा (धाः) धेहि ॥८॥
Connotation: - यथाऽग्निहोत्रादिशिल्पादिसङ्गन्तव्ये व्यवहारे संप्रयुक्तोऽग्निर्दिव्यान् गुणान् प्रकटयति तथैव विदुषा धर्म्यैः कर्मभिः संप्रयुज्य दिव्यानि सुखानि जगति प्रसारणीयानि ॥८॥
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MATA SAVITA JOSHI

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Connotation: - जसा अग्निहोत्र इत्यादी किंवा शिल्प इत्यादीमध्ये संयुक्त केलेला अग्नी उत्तम गुणांना प्रकट करतो, तसेच विद्वान पुरुषांनी धर्मासंबंधी कर्मांनीयुक्त होऊन जगात उत्तम सुख पसरवावे. ॥ ८ ॥