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अ॒हं स यो नव॑वास्त्वं बृ॒हद्र॑थं॒ सं वृ॒त्रेव॒ दासं॑ वृत्र॒हारु॑जम् । यद्व॒र्धय॑न्तं प्र॒थय॑न्तमानु॒षग्दू॒रे पा॒रे रज॑सो रोच॒नाक॑रम् ॥

English Transliteration

ahaṁ sa yo navavāstvam bṛhadrathaṁ saṁ vṛtreva dāsaṁ vṛtrahārujam | yad vardhayantam prathayantam ānuṣag dūre pāre rajaso rocanākaram ||

Pad Path

अ॒हम् । सः । यः । नव॑ऽवास्त्वम् । बृ॒हत्ऽर॑थम् । सम् । वृ॒त्राऽइ॑व । दास॑म् । वृ॒त्र॒ऽहा । अरु॑जम् । यत् । व॒र्धय॑न्तम् । प्र॒थय॑न्तम् । आ॒नु॒षक् । दू॒रे । पा॒रे । रज॑सः । रो॒च॒ना । अक॑रम् ॥ १०.४९.६

Rigveda » Mandal:10» Sukta:49» Mantra:6 | Ashtak:8» Adhyay:1» Varga:8» Mantra:1 | Mandal:10» Anuvak:4» Mantra:6


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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (अहं सः) मैं वह परमात्मा हूँ, जो (वृत्रहा) पाप का नाशक (वृत्रा-इव दासम्-अरुजम्) पापों को जैसे नष्ट करता हूँ, वैसे उपक्षय करनेवाले कामभाव को नष्ट करता हूँ, उस ऐसे को (यः-नववास्त्वं बृहद्रथं सम्) जो मेरे अन्दर नव आयुवाले वसने योग्य ब्रह्मचारी के तथा महद्रमणकारी संन्यासी के योगी के अन्दर प्रवेश करके क्षीण करता है (यत्) जो (वर्धयन्तं प्रथयन्तम्-आनुषक्) शरीर में बढ़ते हुए ब्रह्मचारी को ज्ञान में विस्तार पाते हुए संन्यासी को लिप्त हो जाता है, उसको (रजसः-रोचना दूरे पारे-अकरम्) रञ्जनात्मक लोक अर्थात् शरीर से दूर तथा प्रकाशमान-ज्ञानप्रकाशमय मन से पार करता हूँ-पृथक् करता हूँ-हटाता हूँ ॥६॥
Connotation: - जो ब्रह्मचारी परमात्मा की प्राप्ति के लिए ब्रह्मचर्यसेवन करता है और जो संन्यासी परमात्मा में रमण करता है, उनके अन्दर प्रविष्ट कामभाव को परमात्मा ऐसे हटाता है कि ब्रह्मचारी के शरीर की वृद्धि होती चली जाये और संन्यासी के मन में ज्ञान की वृद्धि होती चली जाये ॥६॥
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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (अहं सः) अहं परमात्मा सोऽस्मि (वृत्रहा) पापनाशकः “पाप्मा वै वृत्रः” [श० ११।१।५।७] (वृत्रा-इव दासम्-अरुजम्) वृत्राणि यथा पापानि यथा नाशयामि तथा दासमुपक्षयकर्त्तारं कामं नाशयामि, कथम्भूतं दासं नाशयामि-उच्यते (यः-नववास्त्वं बृहद्रथं सम्) मयि नववास्तव्यं ब्रह्मचारिणं महद्रमणकारिणं संन्यासिनं योगिनं संविशति संविश्य क्षयं करोति (यत्) यतः (वर्धयन्तं प्रथयन्तम्-आनुषक्) शरीरे वर्धयन्तं ब्रह्मचारिणं मज्ज्ञाने प्रथमानमनुषक्तोऽनुलिप्तोऽस्ति तम् (रजसः रोचना दूरे पारे-अकरम्) लोकात्-लोकनीयशरीरात् दूरे तथा प्रकाशमानात्-ज्ञानप्रकाशमयान्मनसः पारे करोमि ॥६॥