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वातो॑ वा॒ मनो॑ वा गन्ध॒र्वाः स॒प्तवि॑ꣳशतिः। तेऽअग्रेऽश्व॑मयुञ्जँ॒स्तेऽअ॑स्मिन् ज॒वमाद॑धुः ॥७॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

वातः॑। वा॒। मनः॑। वा॒। ग॒न्ध॒र्वाः। स॒प्तवि॑ꣳशति॒रिति॑ स॒प्तऽवि॑ꣳशतिः। ते। अग्रे॑। अश्व॑म्। अ॒यु॒ञ्ज॒न्। ते। अ॒स्मि॒न्। ज॒वम्। आ। अ॒द॒धुः॒ ॥७॥

यजुर्वेद » अध्याय:9» मन्त्र:7


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

मनुष्य लोग किस प्रकार क्या करके वेगवाले हों, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - जो विद्वान् लोग (वातः) वायु के (वा) समान (मनः) मन के (वा) समतुल्य और जैसे (सप्तविंशतिः) सत्ताईस (गन्धर्वाः) वायु, इन्द्रिय और भूतों के धारण करनेहारे (अस्मिन्) इस जगत् में (अग्रे) पहिले (अश्वम्) व्यापकता और वेगादि गुणों को (अयुञ्जन्) संयुक्त करते हैं, (ते) वे ही (जवम्) उत्तम वेग को (आदधुः) धारण करते हैं ॥७॥
भावार्थभाषाः - जो एक समष्टि वायु; प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त और धनञ्जय दश; बारहवाँ मन तथा इस के साथ श्रोत्र आदि दश इन्द्रिय और पाँच सूक्ष्मभूत ये सब २७ सत्ताईस पदार्थ ईश्वर ने इस जगत् में पहिले रचे हैं, जो पुरुष इनके गुण, कर्म और स्वभाव को ठीक-ठीक जान और यथायोग्य कार्य्यों में संयुक्त करके अपनी-अपनी ही स्त्री के साथ क्रीड़ा करते हैं, वे सम्पूर्ण ऐश्वर्य्य को संचित कर राज्य के योग्य होते हैं ॥७॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

मनुष्याः कथं किं कृत्वा वेगवन्तो भवेयुरित्याह ॥

अन्वय:

(वातः) वायुः (वा) इव (मनः) स्वान्तम् (वा) इव (गन्धर्वाः) ये वायव इन्द्रियाणि च धरन्ति ते (सप्तविंशतिः) एतत्संख्याकाः (ते) (अग्रे) (अश्वम्) व्यापकत्ववेगादिगुणसमूहम् (अयुञ्जन्) युञ्जन्ति (ते) (अस्मिन्) जगति (जवम्) वेगम् (आ) (अदधुः)। अयं मन्त्रः (शत०५.१.४.८) व्याख्यातः ॥७॥

पदार्थान्वयभाषाः - ये विद्वांसो वातो वा मनो वा यथा सप्तविंशतिर्गन्धर्वा अस्मिन् जगत्यग्रेऽश्वमयुञ्जँस्ते खलु जवमादधुः ॥७॥
भावार्थभाषाः - यान्येकः समष्टिर्वायुः; प्राणाऽपानव्यानोदानसमाननागकूर्मकृकलदेवदत्तधनञ्जया दश; द्वादशं मनस्तत्सहचरितानि श्रोत्रादीनि दशेन्द्रियाणि पञ्च सूक्ष्मभूतानि च मिलित्वा सप्तविंशति, पूर्वमीश्वरेणास्मिन् जगति वेगवन्ति निर्मितानि, य एतानि यथागुणकर्मस्वभावं विज्ञाय यथायोग्यं कार्य्येषु संप्रयुज्य स्वस्त्रीभिरेव साकं रमन्ते, तेऽखिलमैश्वर्य्यं जनयित्वा राज्यं कर्त्तुमर्हन्ति ॥७॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त व धनंजय हे दहा व समाष्टिवायू अकरा, बारावे मन त्याबरोबरच श्रोत्र इत्यादी दहा इंद्रिये व पाच सूक्ष्म व स्थूल भूत हे सर्व २७ पदार्थ ईश्वराने या जगात प्रथम उत्पन्न केलेले आहेत. जे पुरुष वरील पदार्थांचे गुण, कर्म, स्वभाव जाणून त्यांना यथायोग्य कार्यात युक्त करतात व आपल्या स्त्रीशी एकनिष्ठ असतात त्यांच्याजवळ संपूर्ण ऐश्वर्य येते व ते राज्य करण्यायोग्य असतात.