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प्र नो॑ यच्छत्वर्य॒मा प्र पू॒षा बृह॒स्पतिः॑। प्र वाग्दे॒वी द॑दातु नः॒ स्वाहा॑ ॥२९॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्र। नः॒। य॒च्छ॒तु॒। अ॒र्य्य॒मा। प्र। पू॒षा। प्र। बृह॒स्पतिः॑। प्र। वाक्। दे॒वी। द॒दा॒तु॒। नः॒। स्वाहा॑ ॥२९॥

यजुर्वेद » अध्याय:9» मन्त्र:29


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

प्रजा और सन्तानों से राजा और माता आदि कैसे वर्तें, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - जैसे (अर्य्यमा) न्यायाधीश (नः) हमारे लिये उत्तम शिक्षा (प्रयच्छतु) देवे, जैसे (पूषा) पोषण करनेवाला शरीर और आत्मा की पुष्टि की शिक्षा (प्र) अच्छे प्रकार देवे, जैसे (बृहस्पतिः) विद्वान् (प्र) (स्वाहा) अत्युत्तम विद्या देवे, जैसे (वाक्) उत्तम विद्या सुशिक्षा सहित वाणीयुक्त (देवी) प्रकाशमान पढ़ानेवाली माता हमारे लिये सत्यविद्यायुक्त वाणी का (प्रददातु) उपदेश सदा किया करे ॥२९॥
भावार्थभाषाः - यहाँ जगदीश्वर उपदेश करता है कि राजा आदि सब पुरुष और माता आदि स्त्री सदा प्रजा और पुत्रादिकों को सत्य-सत्य उपदेश कर विद्या और अच्छी शिक्षा को निरन्तर ग्रहण करावें, जिससे प्रजा और पुत्र-पुत्री आदि सदा आनन्द में रहें ॥२९॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

राजा मात्रादयश्च प्रजाः किं किमुपदिशेयुरित्याह ॥

अन्वय:

(प्र) (नः) अस्मभ्यम् (यच्छतु) ददातु (अर्य्यमा) न्यायाधीशः (प्र) (पूषा) पोषकः (प्र) (बृहस्पतिः) विद्वान् (प्र) (वाक्) विद्यासुशिक्षितवाणीयुक्ता (देवी) देदीप्यमानाऽध्यापिका माता (ददातु) (नः) अस्मभ्यम् (स्वाहा) सत्यविद्यायुक्तां वाणीम्। अयं मन्त्रः (शत०५.२.२.११) व्याख्यातः ॥२९॥

पदार्थान्वयभाषाः - यथाऽर्यमा नोऽस्मभ्यं सुशिक्षां प्रयच्छतु, यथा पूषा पुष्टिं प्रददातु, यथा बृहस्पतिः स्वाहा प्रार्पयतु, तथा वाग्देवी माताऽस्मभ्यं विद्यां ददातु ॥२९॥
भावार्थभाषाः - अत्राऽऽह जगदीश्वरः। राजादयः सर्वे पुरुषा मात्रादिस्त्रियश्च सर्वदा प्रजाः पुत्रादीन् प्रति सत्युमपदेशं कुर्य्युर्विद्यां सुशिक्षां च सततं ग्राहयेयुर्यतः प्रजाः सदाऽऽनन्दिताः स्युः ॥२९॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जगदीश्वर असा उपदेश करतो की राजपुरुषांनी प्रजेला व मातांनी आपल्या पुत्रांना सत्य उपदेश करून विद्या व चांगले शिक्षण द्यावे. ज्यामुळे प्रजा व संतती सदैव आनंदात राहतील.