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वाज॑स्य॒ नु प्र॑स॒व आब॑भूवे॒मा च॒ विश्वा॒ भुव॑नानि स॒र्वतः॑। सने॑मि॒ राजा॒ परि॑याति वि॒द्वान् प्र॒जां पुष्टिं॑ व॒र्धय॑मानोऽअ॒स्मे स्वाहा॑ ॥२५॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

वाज॑स्य। नु। प्र॒स॒व इति॑ प्रऽस॒वः। आ। ब॒भू॒व॒। इ॒मा। च॒। विश्वा॑। भुव॑नानि। स॒र्वतः॑। सने॑मि। राजा॑। परि॑। या॒ति॒। वि॒द्वान्। प्र॒जामिति॑ प्र॒ऽजाम्। पुष्टि॑म्। व॒र्धय॑मानः। अ॒स्मेऽइत्य॒स्मे। स्वाहा॑ ॥२५॥

यजुर्वेद » अध्याय:9» मन्त्र:25


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर राजा कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - जो (वाजस्य) वेदादि शास्त्रों से उत्पन्न बोध को (स्वाहा) सत्यनीति से (प्रसवः) प्राप्त होकर (विद्वान्) सम्पूर्ण विद्या को जाननेवाला पुरुष (आ) अच्छे प्रकार (बभूव) होवे (च) और (इमा) इन (विश्वा) सब (भुवनानि) माण्डलिक राजनिवास स्थानों और (सनेमि) सनातन नियम धर्मसहित वर्त्तमान (प्रजाम्) पालने योग्य प्रजाओं को (पुष्टिम्) पोषण (नु) शीघ्र (वर्धयमानः) बढ़ाता हुआ (परि) सब ओर से (याति) प्राप्त होता है, वह (अस्मे) हम लोगों का राजा होवे ॥२५॥
भावार्थभाषाः - ईश्वर सब को उपदेश करता है कि हे मनुष्य लोगो ! तुम जो प्रशंसित गुण, कर्म, स्वभाववाला, राज्य की रक्षा में समर्थ हो, उसको सभाध्यक्ष करके आप्तनीति से चक्रवर्त्ती राज्य करो ॥२५॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुना राजा कीदृशो भवेदित्याह ॥

अन्वय:

(वाजस्य) वेदादिशास्त्रोत्पन्नबोधस्य (नु) शीघ्रम् (प्रसवः) य प्रसूते सः (आ) समन्तात् (बभूव) भवेत् (इमा) इमानि (च) (विश्वा) सर्वाणि (भुवनानि) माण्डलिकराजनिवासस्थानानि (सर्वतः) (सनेमि) सनातनेन नेमिना धर्मेण सह वर्त्तमानं राज्यमण्डलम् (राजा) वेदोक्तराजगुणैः प्रकाशमानः (परि) (याति) प्राप्नोति (विद्वान्) सकलविद्यावित् (प्रजाम्) पालनीयाम् (पुष्टिम्) पोषणम् (वर्धयमानः) (अस्मे) अस्माकम् (स्वाहा) सत्यया नीत्या। अयं मन्त्रः (शत०५.२.२.७) व्याख्यातः ॥२५॥

पदार्थान्वयभाषाः - यो वाजस्य स्वाहा प्रसवो विद्वानाबभूवेमा विश्वा भुवनानि सनेमि च प्रजां पुष्टिं नु वर्धयमानः परियाति सो अस्मे राजा भवतु ॥२५॥
भावार्थभाषाः - ईश्वरोऽभिवदति−हे मनुष्या ! यूयं प्रशंसितगुणकर्मस्वभावो राज्यं रक्षितुं समर्थो भवेत् तं सभाध्यक्षं कृत्वाऽऽप्तनीत्या साम्राज्यं कुरुतेति ॥२५॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - ईश्वर माणसांना उपदेश करतो की ज्याचा गुण, कर्म, स्वभाव राज्यरक्षणासाठी योग्य असेल त्याला राजा करून विद्वानांच्या नीतीनुसार चक्रवर्ती राज्य भोगा.