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क॒कु॒भꣳ रू॒पं वृ॑ष॒भस्य॑ रोचते बृ॒हच्छु॒क्रः शु॒क्रस्य॑ पुरो॒गाः सोमः॒ सोम॑स्य पुरो॒गाः। यत्ते॑ सो॒मादा॑भ्यं॒ नाम॒ जागृ॑वि॒ तस्मै॑ त्वा गृह्णामि॒ तस्मै ते सोम॒ सोमा॑य॒ स्वाहा॑ ॥४९॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

क॒कु॒भम्। रू॒पम्। वृ॒ष॒भस्य॑। रो॒च॒ते॒। बृ॒हत्। शुक्रः। शु॒क्रस्य॑। पु॒रो॒गा इति॑ पुरः॒ऽगाः। सोमः॑। सोम॑स्य। पु॒रो॒गा इति॑ पुरः॒ऽगाः। यत्। ते॒। सो॒म॒। अदा॑भ्यम्। नाम॑। जागृ॑वि। तस्मै॑। त्वा॒। गृ॒ह्णा॒मि॒। तस्मै॑। ते॒। सोम॑। सोमा॑य। स्वाहा॑ ॥४९॥

यजुर्वेद » अध्याय:8» मन्त्र:49


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब फिर गृहस्थों को राजपक्ष में उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (सोम) ऐश्वर्य्य को प्राप्त हुए विद्वन् ! आप (यत्) जिस (वृषभस्य) सब सुखों के वर्षानेवाले आप का (ककुभम्) दिशाओं के समान शुद्ध (बृहत्) बड़ा (रूपम्) सुन्दर स्वरूप (रोचते) प्रकाशमान होता है, सो आप (शुक्रस्य) शुद्ध धर्म्म के (पुरोगाः) अग्रगामी वा (सोमस्य) अत्यन्त ऐश्वर्य्य के (पुरोगाः) अग्रेगन्ता (शुक्रः) शुद्ध (सोमः) सोमगुणसम्पन्न ऐश्वर्य्ययुक्त हूजिये, जिससे आपका (अदाभ्यम्) प्रशंसा करने योग्य (नाम) नाम (जागृवि) जाग रहा है, (तस्मै) उसी के लिये (त्वा) आपको (गृह्णामि) ग्रहण करता हूँ और हे (सोम) उत्तम कामों में प्रेरक ! (तस्मै) उन (सोमाय) श्रेष्ठ कामों में प्रवृत्त हुए (ते) आप के लिये (स्वाहा) सत्य वाणी प्राप्त हो ॥४९॥
भावार्थभाषाः - सभाजन और प्रजाजनों को चाहिये कि जिसकी पुण्य प्रशंसा, सुन्दररूप, विद्या, न्याय, विनय, शूरता, तेज, अपक्षपात, मित्रता, सब कामों में उत्साह, आरोग्य, बल, पराक्रम, धीरज, जितेन्द्रियता, वेदादि शास्त्रों में श्रद्धा और प्रजापालन में प्रीति हो, उसी को सभा का अधिपति राजा मानें ॥४९॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथ गृहस्थान् राजपक्षे पुनरुपदिशति ॥

अन्वय:

(ककुभम्) दिग्वच्छुद्धम् (रूपम्) (वृषभस्य) सुखाभिवर्षकस्य सभापतेः (रोचते) प्रकाशते (बृहत्) (शुक्रः) शुद्धः (शुक्रस्य) शुद्धस्य धर्म्मस्य (पुरोगाः) पुरःसराः (सोमः) सोमगुणसम्पन्नः (सोमस्य) ऐश्वर्य्यगुणयुक्तस्य गृहाश्रमस्य (पुरोगाः) पुरोगामिनः (यत्) यस्य (ते) तव (सोम) प्राप्तैश्वर्य्य विद्वन् ! (अदाभ्यम्) अहिंसनीयम् (नाम) ख्यातिः (जागृवि) जागरूकम् (तस्मै) (त्वा) त्वाम् (गृह्णामि) (तस्मै) (ते) तुभ्यम् (सोम) सत्कर्म्मसु प्रेरक ! (सोमाय) शुभकर्म्मसु प्रवृत्ताय (स्वाहा) सत्या वाक् ॥ अयं मन्त्रः (शत०११.५.९.१०-११) व्याख्यातः ॥४९॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे सोम ! यद्यस्य वृषभस्य बृहत्ककुभं रूपं रोचते, स त्वं शुक्रस्य पुरोगाः शुक्रः पुरोगाः सोमो भव। यत्ते तवादाभ्यन्नाम जागृव्यस्ति तस्मै नाम्ने त्वा गृह्णामि। हे सोम ! तस्मै सोमाय ते तुभ्यं स्वाहाऽस्तु ॥४९॥
भावार्थभाषाः - सभाप्रजाजनैर्यस्य पुण्या प्रशंसा सौन्दर्य्यगुणयुक्तं रूपं विद्यान्यायो विनयः शौर्य्यं तेजः पक्षराहित्यं सुहृत्तोत्साह आरोग्यं बलं पराक्रमो धैर्य्यं जितेन्द्रियता वेदादिशास्त्रे श्रद्धा प्रजापालनप्रियत्वं च वर्तत्ते, स एव सभाधिपती राजा मन्तव्यः ॥४९॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - सभेतील सभासद व प्रजा यांनी सुंदर रूप, विद्या, न्याय, विनय, शौर्य, तेज, भेदभावरहित मित्रता, सर्व कामांत उत्साह, आरोग्य, बल, पराक्रम, धैर्य, जितेन्द्रियता, वेद इत्यादी शास्त्रात श्रद्धा तसेच पुण्यकार्य व प्रशंसायुक्त कार्य करणारा आणि प्रजेबद्दल प्रेम असणारा असेल त्यालाच सभेचा राजा मानावे.