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अदृ॑श्रमस्य के॒तवो॒ वि र॒श्मयो॒ जनाँ॒२ऽअनु॑। भ्राज॑न्तो अ॒ग्नयो॑ यथा। उ॒प॒या॒मगृ॑हीतोऽसि॒ सूर्या॑य त्वा भ्रा॒जायै॒ष ते॒ योनिः॒ सूर्या॑य त्वा भ्रा॒जाय॑। सूर्य॑ भ्राजिष्ठ॒ भ्राजि॑ष्ठ॒स्त्वं दे॒वेष्वसि॒ भ्राजि॑ष्ठो॒ऽहं म॑नु॒ष्ये᳖षु भूयासम् ॥४०॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अदृ॑श्रम्। अ॒स्य॒। के॒तवः॑। वि। र॒श्मयः॑। जना॑न्। अनु॑। भ्राज॑न्तः। अ॒ग्नयः॑। य॒था॒। उ॒प॒या॒मगृ॑हीत॒ इत्यु॑पया॒मऽगृ॑हीतः। अ॒सि॒। सूर्य्या॑य। त्वा॒। भ्रा॒जाय॑। ए॒षः। ते॒। योनिः॑। सूर्या॑य। त्वा॒। भ्रा॒जाय॑। सूर्य्य॑। भ्रा॒जि॒ष्ठ॒। भ्राजि॑ष्ठः। त्वम्। दे॒वेषु॑। अ॒सि॒। भ्राजि॑ष्ठः। अ॒हम्। म॒नु॒ष्ये᳖षु। भू॒या॒सम् ॥४०॥

यजुर्वेद » अध्याय:8» मन्त्र:40


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर भी प्रकारान्तर से पूर्वोक्त विषय ही अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - जैसे (अस्य) इस जगत् के पदार्थों में (भ्राजन्तः) प्रकाश को प्राप्त हुई (रश्मयः) कान्ति (केतवः) वा उन पदार्थों को जनानेवाले (अग्नयः) सूर्य्य, विद्युत् और प्रसिद्ध अग्नि हैं, वैसे ही (जनान्) मनुष्यों को (अनु) एक अनुकूलता के साथ (अदृश्रम्) मैं दिखलाऊँ। हे सभापते ! आप (उपयामगृहीतः) राज्य के नियम और उपनियमों से स्वीकार किये हुए (असि) हैं, जिन (ते) आपका (एषः) यह राज्यकर्म्म (योनिः) ऐश्वर्य्य का कारण है, उन (त्वा) आपको (भ्राजाय) जिलानेवाले (सूर्य्याय) प्राण के लिये चिताता हूँ तथा उन्हीं आपको (भ्राजाय) सर्वत्र प्रकाशित (सूर्य्याय) चराचरात्मा जगदीश्वर के लिये भी चिताता हूँ। हे (भ्राजिष्ठ) अति पराक्रम से प्रकाशमान (सूर्य्य) सूर्य्य के समान सत्य विद्या और गुणों से प्रकाशमान जैसे (त्वम्) आप (देवेषु) समस्त विद्याओं से युक्त विद्वानों में प्रकाशमान (भ्राजिष्ठः) अत्यन्त प्रकाशित हैं, वैसे मैं भी (मनुष्येषु) साधरण मनुष्यों में (भूयासम्) प्रकाशमान होऊँ ॥४०॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे इस संसार में सूर्य्य की किरण सब जगह फैल के प्रकाश करती हैं, वैसे राजा, प्रजा और सभासद् जन शुभ गुण, कर्म्म और स्वभावों में प्रकाशमान हों, क्योंकि ऐसा है कि मनुष्य शरीर पाकर किसी उत्साह पुरुषार्थ सत्पुरुषों का सङ्ग और योगाभ्यास का आचरण करते हुए मनुष्य को धर्म्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि तथा शरीर, आत्मा और समाज की उन्नति करना दुर्लभ नहीं है। इससे सब मनुष्यों को चाहिये कि आलस्य को छोड़ के नित्य प्रयत्न किया करें ॥४०॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनः प्रकारान्तरेण तदेवाह ॥

अन्वय:

(अदृश्रम्) पश्येयम्, अत्र लिङर्थे लुङ्। उत्तमैकवचनप्रयोगो बहुलं छन्दसि [अष्टा०७.१.८] इति रुडागमः। ऋदृशोऽङि गुणः। (अष्टा०७.४.१६) इति प्राप्तौ गुणाभावश्च (अस्य) जगतः (केतवः) ज्ञापकाः (वि) विशेषेण (रश्मयः) किरणाः (जनान्) मनुष्यादीन् प्राणिनः (अनु) (भ्राजन्तः) प्रकाशमानाः (अग्नयः) सूर्य्यविद्युत्प्रसिद्धास्त्रयः (यथा) (उपयामगृहीतः) (असि) (सूर्य्याय) सूर्य्य इव विद्यादिसद्गुणैः प्रकाशमानाय (त्वा) (भ्राजाय) जीवनादिप्रकाशाय (एषः) (ते) (योनिः) चराचरात्मने जगदीश्वराय (त्वा) (भ्राजाय) सर्वत्र प्रकाशमानाय (सूर्य्य) सूर्य्यस्येव न्यायविद्यासु प्रकाशमान (भ्राजिष्ठ) अतिशयेन सुशोभित (भ्राजिष्ठः) (त्वम्) (देवेषु) अखिलविद्यासु प्रकाशमानेषु विद्वत्सु (असि) (भ्राजिष्ठः) (अहम्) (मनुष्येषु) विद्यान्यायाचरणे प्रकाशमानेषु मानवेषु (भूयासम्)। अयं मन्त्रः (शत०४.५.४.११-१२) व्याख्यातः ॥४०॥

पदार्थान्वयभाषाः - यथाऽस्य जगतः पदार्थान् भ्राजन्तो रश्मयः केतवोऽग्नयस्सन्ति, तथैव जनानन्वहमदृश्रम्। त्वमुपयामगृहीतोऽसि यस्य ते तवैष योनिरस्ति, तं त्वां भ्राजाय सूर्याय प्रचोदयामि। तं त्वां भ्राजाय सूर्याय परमात्मने नियोजयामि। हे भ्राजिष्ठ ! सूर्य्य यथां त्वं देवेषु भ्राजिष्ठोऽसि, तथाऽहम्मनुष्येषु भूयासम् ॥४०॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमालङ्कारः। यथेह सूर्य्यकिरणाः सर्वत्र प्रसृताः प्रकाशन्ते, तथा राजप्रजासभाजनाश्शुभगुणकर्मस्वभावेषु प्रकाशमानास्सन्तु। कुतो नहि मनुष्यशरीरं प्राप्य कस्यचिदुत्साहपुरुषार्थसत्पुरुषसङ्गयोगाभ्यासाचरितस्य जनस्य धर्म्मार्थकाममोक्षसिद्धिः शरीरात्मसमाजोन्नतिश्च दुर्लभास्ति, तस्मात् सर्वैरालस्यं त्यक्त्वा नित्यं प्रयतितव्यम् ॥४०॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमालंकार आहे. ज्याप्रमाणे सूर्यकिरणे सर्वत्र प्रकाशित होतात त्याप्रमाणे राजा, प्रजा व सभासद यांनी शुभ गुण, कर्म स्वभावाने प्रकाशित व्हावे. मनुष्य शरीर प्राप्त करून उत्साहाने पुरुषार्थ, सत्संग, योगाभ्यास व धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष यांची सिद्धी व शरीर, आत्मा व समाजाची उन्नती करणे कठीण नाही. त्यासाठी सर्व माणसांनी आळशीपणा सोडून नित्य प्रयत्न करावा.