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अव॑भृथ निचुम्पुण निचे॒रुर॑सि निचुम्पु॒णः। अव॑ दे॒वैर्दे॒वकृ॑त॒मेनो॑ऽयासिष॒मव॒ मर्त्यै॒र्मर्त्य॑कृतं पु॒रु॒राव्णो॑ देव रि॒षस्पा॑हि। दे॒वाना॑ स॒मिद॑सि ॥२७॥

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पद पाठ

अव॑भृ॒थेत्यव॑ऽभृथ। नि॒चु॒म्पु॒णेति॑ निऽचुम्पुण। नि॒चे॒रुरिति॑ निऽचे॒रुः। अ॒सि॒। नि॒चु॒म्पु॒ण इति॑ निऽचुम्पु॒णः। अव॑। दे॒वैः। दे॒वकृ॑त॒मिति॑ दे॒वऽकृ॑तम्। ए॑नः। अ॒या॒सि॒ष॒म्। अव॑। मर्त्यैः॑। मर्त्य॑कृत॒मिति॒ मर्त्य॑कृतम्। पु॒रु॒राव्ण॒ इति॑ पुरु॒ऽराव्णः॑। दे॒व॒। रि॒षः। पा॒हि॒। दे॒वाना॑म्। स॒मिदिति॑ स॒म्ऽइत्। अ॒सि॒ ॥२७॥

यजुर्वेद » अध्याय:8» मन्त्र:27


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर गृहस्थ धर्म्म में स्त्री का विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (अवभृथ) गर्भ के धारण करने के पश्चात् उसकी रक्षा करने (निचुम्पुण) और मन्द-मन्द चलनेवाले पति ! आप (निचुम्पुणः) नित्य मन हरने और (निचेरुः) धर्म्म के साथ नित्य द्रव्य का संचय करनेवाले (असि) हैं तथा (देवानाम्) विद्वानों के बीच में (समित्) अच्छे प्रकार तेजस्वी (असि) हैं। हे (देव) सब से अपनी जय चाहनेवाले ! (देवैः) विद्वान् और (मर्त्यैः) साधारण मनुष्यों के साथ वर्त्तमान आप, जो मैं (देवकृतम्) कामी पुरुषों वा (मृर्त्यकृतम्) साधारण मनुष्यों के किये हुए (एनः) अपराध को (अयासिषम्) प्राप्त होना चाहूँ, उस (पुरुराव्णः) बहुत से अपराध करनेवालों के (रिषः) धर्म्म छुड़ानेवाले काम से मुझे (पाहि) दूर रख ॥२७॥
भावार्थभाषाः - स्त्री अपने पति से नित्य प्रार्थना करे कि जैसे मैं सेवा के योग्य आनन्दित चित्त आप को प्रतिदिन चाहती हूँ, वैसे आप भी मुझे चाहो और अपने पुरुषार्थ भर मेरी रक्षा करो, जिससे मैं दुष्टाचरण करनेवाले मनुष्य के किये हुए अपराध की भागिनी किसी प्रकार न होऊँ ॥२७॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनर्गृहस्थधर्म्मे स्त्रीविषयमाह ॥

अन्वय:

(अवभृथ) यो निषेकेण गर्भं बिभर्त्ति तत्सम्बुद्धौ (निचुम्पुण) नितरां मन्दगामिन् ! (निचेरुः) यो धर्म्मेण द्रव्याणि नित्यं चिनोति (निचुम्पुणः) नित्यं कमनीयः (अव) अर्वागर्थे (देवैः) विद्वद्भिः (देवकृतम्) कामिभिरनुष्ठितम् (एनः) दुष्टाचरणम् (अयासिषम्) प्राप्तवती (अव) निषेधे (मर्त्यैः) मृत्युधर्म्मैः (मर्त्यकृतम्) साधारणमनुष्याचरितम् (पुरुराव्णः) पुरवो बहवो राव्णोऽपराधा दानशीला यस्मिन् तस्मात् (देव) विजिगीषो ! (रिषः) धर्म्मस्य हिंसनात् (पाहि) रक्ष (देवानाम्) विदुषां मध्ये (समित्) सम्यग्दीप्तः (असि)। अयं मन्त्रः (शत०४.४.१.२२-२३ ॥ तथा ४.५.१.१-१६ ॥ तथा ४.५.२.१-३) व्याख्यातः ॥२७॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे अवभृथ निचुम्पुण पते ! त्वं निचुम्पुणो निचेरुरसि देवानां समिदसि। हे देव ! देवैर्मर्त्यैः सह वर्त्तमानस्त्वं यद्देवकृतमेनोऽपराधमहमयासिषं तस्मात् पुरुराव्णो रिषो मां पाहि दूरे रक्ष ॥२७॥
भावार्थभाषाः - स्त्री स्वपतिं नित्यं प्रार्थयेद् यथाहं सेव्यं प्रसन्नचित्तं त्वामनुदिनमिच्छामि, तथा त्वमपि मामिच्छ, स्वबलेन रक्ष च। यतोऽहं कस्यचिद् दुष्टाचरणशीलाज्जनाद् दुश्चरितं कथंचिन्न प्राप्नुयाम्, भवांश्च नाप्नुयात् ॥२७॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - स्त्रीने पतीला म्हटले पाहिजे, ‘‘जशी मी तुमची दररोज सेवा करून आनंदात राहते व तुमच्यावर प्रेम करते तसेच तुम्हीही माझ्यावर प्रेम करा. पुरुषार्थाने माझे रक्षण करा. पापी व्यक्तीपासून मी दूर राहावे, अशी उपाययोजना करा. ’’