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सं वर्च॑सा॒ पय॑सा॒ सं त॒नूभि॒रग॑न्महि॒ मन॑सा॒ सꣳशि॒वेन॑। त्वष्टा॑ सु॒दत्रो॒ विद॑धातु॒ रायोऽनु॑मार्ष्टु त॒न्वो᳕ यद्विलि॑ष्टम् ॥१६॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सम्। वर्च॑सा। पय॑सा। सम्। त॒नूभिः॑। अग॑न्महि। मन॑सा। सम्। शि॒वेन॑। त्वष्टा॑। सु॒दत्र॒ इति॑ सु॒ऽदत्रः॑। वि। द॒धा॒तु॒। रायः॑। अनु॑। मा॒र्ष्टु॒। त॒न्वः᳖। यत्। विलि॑ष्ट॒मिति॒ विऽलि॑ष्टम् ॥१६॥

यजुर्वेद » अध्याय:8» मन्त्र:16


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर भी उक्त विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे आप्त अत्युत्तम विद्वानो ! आप लोगों की सुमति में प्रवृत्त हुए हम लोग जो आप लोगों के मध्य (सुदत्रः) विद्या के दान से विज्ञान को देने और (त्वष्टा) अविद्यादि दोषों का नष्ट करनेवाला विद्वान् हम को (संवर्च्चसा) उत्तम दिन और (पयसा) रात्रि से (संशिवेन) अति कल्याणकारक (मनसा) विज्ञान से (यत्) जिस (तन्वः) शरीर से हानिकारक कर्म्म को (अनुमार्ष्टु) दूर करे और (रायः) पुष्टिकारक द्रव्यों को (विदधातु) प्राप्त करावें, उस और उन पदार्थों को (समगन्महि) प्राप्त हों ॥१६॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को चाहिये कि दिन रात उत्तम सज्जनों के सङ्ग से धर्म्मार्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि करते रहें ॥१६॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तदेवाह

अन्वय:

(सम्) एकीभावे (वर्चसा) तेजसा (पयसा) रात्र्या, पय इति रात्रिनामसु पठितम्। (निघं०१.७) (सम्) (तनूभिः) बलविशिष्टशरीरैर्विद्वद्भिः। (अगन्महि) प्राप्नुयाम (मनसा) मननेन (सम्) (शिवेन) सुखप्रदेन (त्वष्टा) अविद्याविच्छेदकः (सुदत्रः) सुष्ठु ज्ञानकर्त्ता (विदधातु) (रायः) विद्यादिधनानि (अनु) (मार्ष्टु) (तन्वः) शरीरस्य (यत्) (विलिष्टम्) रोमादिमललेशम्। अयं मन्त्रः (शत०४.४.४.८) व्याख्यातः ॥१६॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे आप्ता विद्वांसः ! युष्माकं सुमतौ प्रवृत्ता वयं यो युष्माकं मध्ये श्रेष्ठः सुदत्रस्त्वष्टा विद्वानस्मभ्यं संवर्चसा पयसा संशिवेन मनसा यान् रायो विदधातु यत् तन्वो विलिष्टमनुमार्ष्टु तैस्तांस्तच्चागन्महि ॥१६॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यैरहर्निशमाप्तसङ्गेन धर्म्मार्थकाममोक्षाः सम्यक् साधनीयाः ॥१६॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - सतत सज्जनांची संगत धरुन माणसांनी धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष सिद्ध करावेत.