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यस्ते॑ऽअश्व॒सनि॑र्भ॒क्षो यो गो॒सनि॒स्तस्य॑ तऽइ॒ष्टय॑जुष स्तु॒तस्तो॑मस्य श॒स्तोक्थ॒स्योप॑हूत॒स्योप॑हूतो भक्षयामि ॥१२॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यः। ते॒। अ॒श्व॒सनि॒रित्य॑श्व॒ऽसनिः॑। भ॒क्षः। यः। गो॒सनि॒रिति॑ गो॒ऽसनिः॑। तस्य॑। ते॒। इ॒ष्टय॑जुष॒ इती॒ष्टऽय॑जुषः। स्तु॒तस्तो॑म॒स्येति॑ स्तु॒तऽस्तो॑मस्य। श॒स्तोक्थ॒स्येति॑ श॒स्तऽउ॑क्थ॒स्य। उप॑हूत॒स्येत्युप॑ऽहूतस्य। उप॑हूत॒ इत्युप॑ऽहूतः। भ॒क्ष॒या॒मि॒ ॥१२॥

यजुर्वेद » अध्याय:8» मन्त्र:12


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब गृहस्थों की मित्रता अगले मन्त्र में कही है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे प्रियवीर पुरुष मित्र ! जो आप (उपहूतः) मुझ से सत्कार को प्राप्त होकर (अश्वसनिः) अग्नि आदि पदार्थ वा घोड़ों और (गोसनिः) संस्कृत वाणी, भूमि और विद्या प्रकाश आदि अच्छे पदार्थों के देनेवाले (असि) हैं, उन (शस्तोक्थस्य) प्रशंसित ऋग्वेद के सूक्तयुक्त (इष्टयजुषः) इष्ट सुखकर यजुर्वेद के भागयुक्त वा (स्तुतस्तोमस्य) सामवेद के गान के प्रशंसा करनेहारे (ते) आप का (यः) जो (भक्षः) चाहना से भोजन करने योग्य पदार्थ है, उस को आप से सत्कृत हुई मैं (भक्षयामि) भोजन करूँ तथा हे प्रिय सखि ! जो तू अग्नि आदि पदार्थ वा घोड़ों के देने और संस्कृत वाणी, भूमि, विद्या, प्रकाश आदि अच्छे-अच्छे पदार्थ देनेवाली है, उस प्रशंसनीय ऋक्सूक्त यजुर्वेद भाग से स्तुति किये हुए सामगान करनेवाली तेरा जो यह भोजन करने योग्य पदार्थ है, उस को अच्छे मान से बुलाया हुआ मैं भोजन करता हूँ ॥१२॥
भावार्थभाषाः - अच्छे उत्साह बढ़ानेवाले कामों में गृहाश्रम का आचरण करनेवाली स्त्री अपनी सहेलियों वा पुरुष गृहाश्रमी पुरुष अपने इष्टमित्र और बन्धुजन आदि को बुला कर भोजन आदि पदार्थों से यथायोग्य सत्कार करके प्रसन्न करें और परस्पर भी सदा प्रसन्न रहें और उपदेश, शास्त्रार्थ, विद्या, वाग्विलास को करें ॥१२॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथ गृहस्थानां मित्रतामाह ॥

अन्वय:

(यः) (ते) तव (अश्वसनिः) अश्वानामग्न्यादिपदार्थानां वा सनिर्दाता (भक्षः) सेवनीयः (यः) (गोसनिः) संस्कृतवाचो भूमेर्विद्याप्रकाशादेः सनिर्दाता (तस्य) (ते) तव (इष्टयजुषः) इष्टानि यजूषिं यस्य (स्तुतस्तोमस्य) स्तुतः स्तोमः सामवेदगानविशेषो येन सः (शस्तोक्थस्य) शस्तानि प्रशंसितानि उक्थानि ऋक्सूक्तानि येन यस्य (उपहूतस्य) सत्कारेणाहूयोपस्थितस्य (उपहूतः) सम्मानित उपस्थितः (भक्षयामि) लेट्प्रयोगोऽयम्। अयं मन्त्रः (शत०४.४.३.११-१३) व्याख्यातः ॥१२॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे प्रिय वीरपते ! यस्त्वं मयोपहूतोऽश्वसनिर्गोसनिरसि, तस्य शस्तोक्थस्येष्टयजुषः स्तुतस्तोमस्योपहूतस्य तव यो भक्षोऽस्ति, तमुपहूता सत्यहं भक्षयामि। हे प्रिये सखे ! या त्वमश्वसनिर्गोसनिरसि, तस्याः शस्तो कथाया इष्टयजुषः स्तुतस्तोमाया उपहूतायास्ते तव यो भक्षोऽस्ति, तमुपहूतोऽहं भक्षयामि ॥१२॥
भावार्थभाषाः - सदुत्साहवर्द्धकेषु कार्य्येषु गृहाश्रममाचरन्त्यः स्त्रियः स्वसखिस्त्रीजनान् गृहाश्रममिणः पुरुषा वा स्वेष्टमित्रबन्धुजनादीनाहूय यथायोग्यं सत्कारेण भोजनादिना प्रसादयेयुरन्योन्यमुपदेशं शास्त्रार्थं विद्यावाग्विलासं च कुर्य्युः ॥१२॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - गृहस्थाश्रमी स्त्रीने कार्य करताना उत्साही बनून आपल्या मैत्रिणींना व पुरुषांनी आपले इष्टमित्र आणि नातेवाईक इत्यादींना आमंत्रित करावे व भोजन वगैरेनी त्यांचा सत्कार करून प्रसन्न करावे व परस्परही सदैव प्रसन्न राहावे. उपदेश, शास्त्रार्थ, विद्या वाग्विलासात जीवन घालवावे.