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अग्ने॒ नय॑ सु॒पथा॑ रा॒येऽअ॒स्मान् विश्वा॑नि देव व॒युना॑नि वि॒द्वान्। यु॒यो॒ध्य᳕स्मज्जु॑हुरा॒णमेनो॒ भूयि॑ष्ठां ते॒ नम॑ऽउक्तिं विधेम॒ स्वाहा॑ ॥४३॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अग्ने॑। नय॑। सु॒पथेति॑ सु॒ऽपथा॑। रा॒ये। अ॒स्मान्। विश्वा॑नि। दे॒व॒। व॒युना॑नि। वि॒द्वान्। यु॒यो॒धि। अ॒स्मत्। जु॒हु॒रा॒णम्। एनः॑। भूयि॑ष्ठाम्। ते॒। नम॑उक्ति॒मिति॒ नमः॑ऽउक्तिम्। वि॒धे॒म्। स्वाहा॑ ॥४३॥

यजुर्वेद » अध्याय:7» मन्त्र:43


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब ईश्वर की प्रार्थना अगले मन्त्र में कही है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (अग्ने) सब के अन्तःकरण में प्रकाश करनेवाले परमेश्वर ! आप (सुपथा) सत्यविद्या धर्म्मयोगयुक्त मार्ग से (राये) योग की सिद्धि के लिये (अस्मान्) हम लोगों को (विश्वानि) समस्त (वयुनानि) योग के विद्वानों को (नय) पहुँचाइये जिससे हम लोग (स्वाहा) अपनी सत्यवाणी वा वेदवाणी से (ते) आप की (भूयिष्ठाम्) बहुत (नमउक्तिम्) नमस्कारपूर्वक स्तुति को (विधेम) करें। हे (देव) योगविद्या को देनेवाले ईश्वर ! (विद्वान्) समस्त योग के गुण और क्रियाओं को जाननेवाले आप कृपा करके (जुहुराणम्) हम लोगों के अन्तःकरण के कुटिलतारूप (एनः) दुष्ट कर्म्मों को (अस्मत्) योगानुष्ठान करनेवाले हम लोगों से (युयोधि) दूर कर दीजिये ॥४३॥
भावार्थभाषाः - कोई भी पुरुष परमात्मा की प्रेमभक्ति के विना योगसिद्धि को प्राप्त नहीं होता और जो प्रेम-भक्तियुक्त होकर योगबल से परमेश्वर का स्मरण करता है, उसको वह दयालु परमात्मा शीघ्र योगसिद्धि देता है ॥४३॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथैतदीश्वरप्रार्थनामाह ॥

अन्वय:

(अग्ने) सर्वेषां प्रकाशक ! (नय) प्रापय (सुपथा) योगमार्गेण (राये) योगसिद्धये (अस्मान्) योगिनः (विश्वानि) अखिलानि (देव) योगप्रद ! (वयुनानि) योगविज्ञानानि (विद्वान्) यो वेत्ति सर्वं योगं सः (युयोधि) वियोजय (अस्मत्) अस्माकं योगानुष्ठातॄणां सकाशात् (जुहुराणम्) अस्मदन्तःकरणस्य कौटिल्यम् (एनः) दुष्कृतात्मकमपराधम् (भूयिष्ठाम्) भूयसीम् (ते) तव योगोपदेष्टुः परमगुरोः (नमउक्तिम्) नातिपुरःसरां स्तुतिम् (विधेम) कुर्य्याम (स्वाहा) सत्यया स्वकीयया वाचा वेदवाचा वा ॥ अयं मन्त्रः (शत०४.३.४.१२) व्याख्यातः ॥४३॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे अग्ने ! त्वं राये अस्मान् विश्वानि वयुनानि नय। यतो वयं स्वाहा ते भूयिष्ठां नमउक्तिं विधेम। हे देव ! विद्वंस्त्वं कृपया जुहुराणमेनश्चास्मद्युयोधि ॥४३॥
भावार्थभाषाः - न कश्चिदपि पुरुषः परमात्मनः सत्यप्रेमभक्त्या विना योगसिद्धिं प्राप्नोति, यश्चेत्थम्भूतो योगबलेन परमेश्वरं स्मरति, तस्मै स दयालुः शीघ्रं योगसिद्धिं ददाति ॥४३॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - कोणताही माणूस परमेश्वर भक्तीशिवाय योगसिद्धी प्राप्त करू शकत नाही व जो श्रद्धायुक्त अंतःकरणाने व योगाच्या साह्याने परमेश्वराचे स्मरण करतो त्याला दयाळू परमेश्वराकडून तत्काळ योगसिद्धीची प्राप्ती होते.