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हृ॒दे त्वा॒ मन॑से त्वा॒ दि॒वे त्वा॒ सूर्या॑य त्वा। ऊ॒र्ध्वमि॒मम॑ध्व॒रं दि॒वि दे॒वेषु॒ होत्रा॑ यच्छ ॥२५॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

हृ॒दे। त्वा॒। मन॑से। त्वा॒। दि॒वे। त्वा॒। सूर्य्या॑य। त्वा॒। ऊ॒र्ध्वम्। इ॒मम्। अ॒ध्व॒रम्। दि॒वि। दे॒वेषु॑। होत्राः॑। य॒च्छ॒ ॥२५॥

यजुर्वेद » अध्याय:6» मन्त्र:25


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर से क्या-क्या उपदेश करें, यह अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे ब्रह्मचारिणी कन्या ! तू जैसे हम सब (देवेषु) अपने सुख देनेवाले पतियों के निकट रहने और (होत्राः) अग्निहोत्र आदि कर्म का अनुष्ठान करनेवाली हैं, वैसी हो और जैसे हम (हृदे) सौहार्द्द सुख के लिये (त्वा) तुझे वा (मनसे) भला-बुरा विचारने के लिये (त्वा) तुझे वा (दिवे) सब सुखों के प्रकाश करने के लिये (त्वा) तुझे वा (सूर्य्याय) सूर्य्य के सदृश गुणों के लिये (त्वा) तुझे शिक्षा करती हैं, वैसे तू भी (दिवि) समस्त सुखों के प्रकाश करने के निमित्त (इमम्) इस (अध्वरम्) निरन्तर सुख देनेवाले गृहाश्रमरूपी यज्ञ को (ऊर्ध्वम्) उन्नति (यच्छ) दिया कर ॥२५॥
भावार्थभाषाः - जैसे अपने पतियों की सेवा करती हुई उनके समीप रहनेवाली पतिव्रता गुरुपत्नियाँ अग्निहोत्रादि कर्मों में स्थिर बुद्धि रखती हैं, वैसे विवाह के अनन्तर ब्रह्मचारिणी कन्याओं और ब्रह्मचारियों को परस्पर वर्तना चाहिये ॥२५॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्ताः किं किमुपदिशेयुरित्याह ॥

अन्वय:

(हृदे) हृत्सुखाय (त्वा) त्वाम् (मनसे) सदसन्मननाय (त्वा) त्वाम् (दिवे) सर्वसुखद्योतनात् (त्वा) त्वाम् (सूर्य्याय) सूर्यगुणाय (त्वा) त्वाम् (ऊर्ध्वम्) उत्कृष्टम् (इमम्) प्रत्यक्षम् (अध्वरम्) अविनश्वरं यज्ञम् (दिवि) शुभगुणप्रकाशे (देवेषु) विद्वत्सु (होत्राः) हवनकर्मानुष्ठात्र्यः (यच्छ) उपगृह्णीहि ॥ अयं मन्त्रः (शत०३.९.३.४-५) व्याख्यातः ॥२५॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे ब्रह्मचारिणि कन्ये ! त्वं यथा वयं सर्वा देवेषु स्वपतिषु समीपवर्त्तिन्यो होत्रा हवनकर्मानुष्ठात्र्यः स्मस्तथा भव, यथा वयं हृदे त्वा मनसे त्वा दिवे त्वा सूर्य्याय त्वानुशास्मस्तथा दिवीममध्वरमूर्ध्वं यच्छ ॥२५॥
भावार्थभाषाः - यथा पतिव्रताः स्वपतिषु तत्प्रियमाचरन्त्यैऽग्निहोत्रादिकर्मसु निरताः स्युस्तथा विवाहानन्तरं ब्रह्मचारिणीभिर्ब्रह्मचारिभिरपि परस्परमनुवर्त्तितव्यमिति ॥२५॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - ज्याप्रमाणे आपल्या पतीची सेवा करणारी व त्याच्याजवळ राहणारी पतिव्रता गुरुपत्नी अग्निहोत्र इत्यादी कर्मामध्ये स्थिर बुद्धी ठेवते त्याप्रमाणेच विवाहानंतर ब्रह्मचारी व ब्रह्मचारिणी यांनी परस्पर वर्तन करावे.