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मापो मौष॑धीर्हिꣳसी॒र्धाम्नो॑ धाम्नो राजँ॒स्ततो॑ वरुण नो मुञ्च। यदा॒हुर॒घ्न्याऽइति॒ वरु॒णेति॒ शपा॑महे॒ ततो॑ वरुण नो मुञ्च। सु॒मि॒त्रि॒या न॒ऽआप॒ऽओष॑धयः सन्तु दुर्मित्रि॒यास्तस्मै॑ सन्तु॒ यो᳕ऽस्मान् द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्मः ॥२२॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

मा। अ॒पः। मा। ओष॑धीः। हि॒ꣳसीः॒। धाम्नो॑धाम्न॒ इति॑ धाम्नः॑ऽधाम्नः। रा॒ज॒न्। ततः॑। व॒रु॒ण। नः॒। मु॒ञ्च॒। यत्। आ॒हुः॒। अ॒घ्न्याः। इति॑। वरु॑ण। इति॑। शपा॑महे। ततः॑। व॒रु॒ण॒। नः॒। मु॒ञ्च॒। सु॒मि॒त्रि॒या इति॑ सु॑ऽमि॒त्रि॒याः। नः॒। आपः॑। ओष॑धयः। स॒न्तु॒। दु॒र्मि॒त्रि॒या इति॑ दुःऽमित्रि॒याः। तस्मै॑। स॒न्तु॒। यः। अस्मान्। द्वेष्टि॑। यम्। च॒। व॒यम्। द्वि॒ष्मः ॥२२॥

यजुर्वेद » अध्याय:6» मन्त्र:22


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब व्यापार करने के लिये राज्यप्रबन्ध अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (राजन्) सभापति ! आप प्रत्येक स्थानों में (अपः) जल और (ओषधीः) अन्न-पान पदार्थ तथा किराने आदि वणिज पदार्थों को (मा) मत (हिंसीः) नष्ट करो अर्थात् प्रत्येक जगह हम लोगों को सब इष्ट पदार्थ मिलते रहें, न केवल यही करो, किन्तु (ततः) उस (धाम्नः धाम्नः) स्थान-स्थान से (नः) हम लोगों को (मा) मत (मुञ्च) त्यागो। हे (वरुण) न्याय करनेवाले सभापति ! किये हुए न्याय में (अघ्न्याः) न मारने योग्य गौ आदि पशुओं की शपथ है (इति) इस प्रकार जो आप कहते हैं और हम लोग भी (शपामहे) शपथ करते हैं और आप भी उस प्रतिज्ञा को मत छोडि़ये और हम लोग भी न छोड़ेंगे। हे वरुण ! आपके राज्य में (नः) हम लोगों को (आपः) जल और ओषधियाँ (सुमित्रियाः) श्रेष्ठमित्र के तुल्य (सन्तु) हों तथा (यः) जो (अस्मान्) हम लोगों से (द्वेष्टि) वैर रखता है (च) और (वयम्) हम लोग (यम्) जिससे (द्विष्मः) वैर करते हैं, (तस्मै) उस के लिये वे ओषधियाँ (दुर्मित्रियाः) दुःख देने देनेवाले शत्रु के तुल्य (सन्तु) हों ॥२२॥
भावार्थभाषाः - राजा और राजाओं के कामदार लोग अनीति से प्रजाजनों का धन न लेवें, किन्तु राज्य-पालन के लिये राजपुरुष प्रतिज्ञा करें कि हम लोग अन्याय न करेंगे अर्थात् हम सर्वदा तुम्हारी रक्षा और डाकू, चोर, लम्पट-लवाड़, कपटी, कुमार्गी, अन्यायी और कुकर्मियों को निरन्तर दण्ड देवेंगे ॥२२॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथ वाणिज्यार्थं राजप्रबन्धमाह ॥

अन्वय:

(मा) निषेधे (अपः) जलानि (मा) निषेधे (ओषधीः) यवादीन् (हिंसीः) (धाम्नो धाम्नः) स्थानात् स्थानात् (राजन्) सभापते ! (ततः) तस्मात् (वरुण) प्रशस्त (नः) अस्मान् (मुञ्च) (यत्) (आहुः) (अघ्न्याः) हन्तुमयोग्या गावस्ताः। अघ्न्या इति गोनामसु पठितम्। (निघं०२.११) (इति) अनेन प्रकारेण (वरुण) न्यायकारिन् ! (इति) प्रकारान्तरे (शपामहे) (सुमित्रियाः) सुमित्राणीव (नः) अस्मभ्यम् (आपः) (ओषधयः) (सन्तु) (दुर्मित्रियाः) दुर्मित्राणीव (तस्मै) द्विषते (सन्तु) (यः) अमित्रः (अस्मान्) (द्वेष्टि) (यम्) (च) (वयम्) (द्विष्मः) ॥ अयं मन्त्रः (शत०३.८.५.९-११) व्याख्यातः ॥२२॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे राजन् ! ओषधीश्च मा हिंसीः। न केवलमिदमेव कुर्याः, किन्तु ततो धाम्नो धाम्नोऽस्मान् मा मुञ्च। हे वरुण ! अघ्न्या इति यद्भवन्त आहुः वयं चेत्थं शपामहे ततस्त्वं मा मुञ्च वयमपि न मुञ्चामः। हे वरुण ! नः अस्मभ्यमाप ओषध्यश्च सुमित्रियास्सुमित्रवत् सन्तु, योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तस्मै दुर्मित्रियाः शत्रुवत् सन्तु ॥२२॥
भावार्थभाषाः - राजपुरुषाः प्रजाभ्योऽनीत्या धनं न गृह्णीयुः। राजरक्षणाय प्रतिज्ञां कुर्युरन्यायं वयं न करिष्याम इति दुष्टान् सततं दण्डयेयुरिति ॥२२॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - राजा व राज्याचे कर्मचारी यांनी अन्यायाने प्रजेचे धन लुबाडू नये. उलट राजपुरुषांनी राज्याचे पालन करण्यासाठी अशी प्रतिज्ञा करावी की, आम्ही अन्याय करणार नाही. अर्थात नेहमी तुमचे रक्षण करून डाकू, चोर, लंपट, लबाड, कपटी, कुमार्गी, अन्यायी व कुकर्मी यांना दंड देऊ.