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परि॑ त्वा गिर्वणो॒ गिर॑ऽइ॒मा भ॑वन्तु वि॒श्वतः॑। वृ॒द्धायु॒मनु॒ वृद्ध॑यो॒ जुष्टा॑ भवन्तु॒ जुष्ट॑यः ॥२९॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

परि॑। त्वा। गि॒र्व॒णः॒। गिरः॑। इ॒माः। भ॒व॒न्तु॒। वि॒श्वतः॑। वृ॒द्धायु॒मिति॑ वृ॒द्धऽआ॑युम्। अनु॑। वृद्ध॑यः। जुष्टाः॑। भ॒व॒न्तु॒। जुष्ट॑यः ॥२९॥

यजुर्वेद » अध्याय:5» मन्त्र:29


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

ईश्वर और सभाध्यक्ष से क्या-क्या होने को योग्य है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (गिर्वणः) स्तुतियों से स्तुति करने योग्य ईश्वर वा सभाध्यक्ष ! (इमाः) ये मेरी की हुई (विश्वतः) समस्त (गिरः) स्तुतियाँ (परि) सब प्रकार से (भवन्तु) हों और उसी समय की ही न हों, किन्तु (वृद्धायुम्) वृद्धों के समान आचरण करनेवाले आपके (अनु) पश्चात् (वृद्धयः) अत्यन्त बढ़ती हुई और (जुष्टयः) प्रीति करने योग्य (जुष्टाः) प्यारी हों ॥२९॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। जैसे सम्पूर्ण उत्तम गुण, कर्म्मों के साथ वर्त्तमान जगदीश्वर और सभापति स्तुति करने योग्य हैं, वैसे ही तुम लोगों को भी होना चाहिये ॥२९॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

ईश्वरसभाध्यक्षाभ्यां किं किं भवितुं योग्यमित्युपदिश्यते ॥

अन्वय:

(परि) सर्वतः (त्वा) त्वाम् (गिर्वणः) गीर्भिः स्तोतुमर्हः (गिरः) स्तुतिवाचः (इमाः) मत्कृताः (भवन्तु) (विश्वतः) सर्वाः, अत्र प्रथमान्तात् तसिः। (वृद्धायुम्) वृद्ध इव आचरन्तम्, क्याच्छन्दसि। [अष्टा०३.२.१७०] इत्युः। (अनु) पश्चाद्भावे (वृद्धयः) वृध्यन्ते यास्ताः। (जुष्टाः) प्रीताः सेविता वा। (भवन्तु) (जुष्टयः) जुष्यन्ते प्रीयन्ते यास्ताः। अयं मन्त्रः (शत०३.६.१.२४) व्याख्यातः ॥२९॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे गिर्वण ईश्वर सभाध्यक्ष ! इमा मत्कृता विश्वतो गिरस्त्वां परि परितो भवन्तु। न तत्क्षण एव, किन्तु वृद्धायुं त्वामनु वृद्धयो जुष्टयो जुष्टाश्च भवन्तु ॥२९॥
भावार्थभाषाः - अत्र श्लेषालङ्कारः। हे मनुष्या ! यथाऽखिलैः शुभगुणकर्म्मभिः सह वर्त्तमानो जगदीश्वरः सभापतिर्वा स्तोतुमर्होऽस्ति, तथैव युष्माभिरपि भवितव्यम् ॥२९॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात श्लेषालंकार आहे. हे माणसांनो ! ज्याप्रमाणे संपूर्ण उत्तम गुणकर्मयुक्त ईश्वर व सभ्याध्यक्ष (राजा) हे स्तुती करण्यायोग्य असतात त्याप्रमाणे तुम्हीही तसेच बनले पाहिजे.