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स्व॒राड॑सि सपत्न॒हा स॑त्र॒राड॑स्यभिमाति॒हा ज॑न॒राड॑सि रक्षो॒हा स॑र्व॒राड॑स्यमित्र॒हा ॥२४॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

स्व॒राडिति॑ स्व॒ऽराट्। अ॒सि॒। स॒प॒त्न॒हेति॑ सपत्न॒ऽहा। स॒त्र॒राडिति॑ सत्र॒ऽराट्। अ॒सि॒। अ॒भि॒मा॒ति॒हेत्य॑भिमाति॒ऽहा। ज॒न॒राडिति॑ जन॒ऽराट्। अ॒सि॒। र॒क्षो॒हेति॑ रक्षः॒ऽहा। स॒र्व॒राडिति॑ सर्व॒ऽराट्। अ॒सि॒। अ॒मि॒त्र॒हेत्य॑मित्र॒ऽहा ॥२४॥

यजुर्वेद » अध्याय:5» मन्त्र:24


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब अगले मन्त्र में सूर्य और सभाध्यक्ष के गुणों का उपदेश किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे विद्वान् मनुष्य ! जिस कारण आप (स्वराट्) अपने आप प्रकाशमान (असि) हैं, इससे (सपत्नहा) शत्रुओं के मारनेवाले होते हो। जिस कारण तुम (सत्रराट्) यज्ञों में प्रकाशमान हो, इससे (अभिमातिहा) अभिमानयुक्त मनुष्यों को मारनेवाले होते हो, जिस से (जनराट्) धार्मिक विद्वानों में प्रकाशित हैं, इससे (रक्षोहा) राक्षस दुष्टों को मारनेवाले होते हैं, जिससे आप (सर्वराट्) सब में प्रकाशित हैं, इस से (अमित्रहा) अमित्र अर्थात् शत्रुओं के मारनेवाले होते हैं ॥१॥२४॥ जिस कारण यह सूर्यलोक (स्वराट्) अपने आप (असि) प्रकाशित है, इससे (सपत्नहा) मेघ के अवयवों को काटनेवाला होता है। जिस कारण यह (सत्रराट्) यज्ञों में प्रकाशित (असि) है, इससे (अभिमातिहा) अभिमानकारक चोर आदि का हनन करनेवाला होता है। जिस कारण यह (जनराट्) धार्मिक विद्वानों के मन में प्रकाशित (असि) है, इससे (रक्षोहा) राक्षस वा दुष्टों का हनन करनेवाला होता है। जिस से यह (सर्वराट्) सब में प्रकाशमान (असि) है, इससे (अमित्रहा) दुष्टों को दण्ड देने का निमित्त होता है ॥२॥२४॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। विद्वान् मनुष्य ! जैसे सूर्य अपने प्रकाश से चोर, व्याघ्र आदि प्राणियों को भय दिखा कर अन्य प्राणियों को सुखी करता है, वैसे ही तू भी सब शत्रुओं को निवारण कर प्रजा को सुखी कर ॥२४॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथ सूर्यसभाद्यध्यक्षगुणा उपदिश्यन्ते ॥

अन्वय:

(स्वराट्) यः स्वयं राजते सः (असि) अस्ति वा, अत्र सर्वत्र पक्षे व्यत्ययः। (सपत्नहा) यः सपत्नान् शत्रून् मेघावयवान् वा हन्ति सः (सत्रराट्) यः सत्रेषु यज्ञेषु राजते सः (असि) अस्ति वा (अभिमातिहा) येऽभिमिमत इत्यभिमातयस्तान् हन्ति सः, अत्रौणादिकः क्तिच्। (जनराट्) यो जनेषु धार्मिकेषु विद्वत्सु राजते सः (असि) अस्ति वा (रक्षोहा) यो रक्षांसि दुष्टान् हन्ति सः (सर्वराट्) यः सर्वस्मिन् राजते सः (असि) अस्ति वा (अमित्रहा) यो येन वाऽमित्रान् शत्रून् हन्ति सः। अयं मन्त्रः (शत०३.५.४.१४) व्याख्यातः ॥२४॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे विद्वन् मनुष्य ! यतस्त्वं स्वराडसि तस्मात् सपत्नहाऽसि भवसि। यतस्त्वं सत्रराडसि तस्माभिमातिहा वर्तसे, यतस्त्वं जनराडसि तस्माद्रक्षोहाऽसि भवसि। यतस्त्वं सर्वराडसि तस्मादमित्रहाऽसि भवसि। यतस्त्वं सर्वराडसि तस्मादमित्रहाऽसि भवसीत्येकः ॥१॥२४॥ यतोऽयं सूर्यलोकः स्वराडस्ति तस्मात् सपत्नहा भवति, यतोऽयं सत्रराडस्ति तस्मादभिमातिहा वर्त्तते। यतोऽयं जनराडस्ति तस्माद्रक्षोहा जायते। यतोऽयं सर्वराडस्ति तस्मादमित्रहा वर्त्तत इति द्वितीयः ॥२॥२४॥
भावार्थभाषाः - अत्र श्लेषालङ्कारः। हे विद्वन् ! यथा सूर्यः स्वप्रकाशेन चोरव्याघ्रादीन् भीषयित्वा सर्वान् सुखयति तथैव त्वं शत्रून्निवार्य्य प्रजाः सुखय ॥२४॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात श्लेषालंकार आहे. हे विद्वान माणसा ! सूर्य जसा आपल्या प्रकाशाने चोर, वाघ इत्यादी प्राण्यांना भयभीत करून इतर प्राण्यांना सुखी करतो तसे तुही सर्व शत्रूंचे निवारण करून लोकांना सुखी कर.