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विश्वो॑ दे॒वस्य॑ ने॒तुर्मर्त्तो॑ वुरीत स॒ख्यम्। विश्वो॑ रा॒यऽइ॑षुध्यति द्यु॒म्नं वृ॑णीत पु॒ष्यसे॒ स्वाहा॑ ॥८॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

विश्वः॑। दे॒वस्य॑। ने॒तुः। मर्त्तः॑। वु॒री॒त॒। स॒ख्यम्। विश्वः॑। रा॒ये। इ॒षु॒ध्य॒ति॒। द्यु॒म्नम्। वृ॒णी॒त॒। पु॒ष्यसे॑। स्वाहा॑ ॥८॥

यजुर्वेद » अध्याय:4» मन्त्र:8


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

मनुष्यों को परमेश्वर के आश्रय से क्या-क्या करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - जैसे (विश्वः) सब (मर्तः) मनुष्य (नेतुः) सब को प्राप्त वा (देवस्य) सब का प्रकाश करनेवाले परमेश्वर के साथ (सख्यम्) मित्रता और गुणकर्मसमूह को (वुरीत) स्वीकार और (विश्वः) सब (राये) धन की प्राप्ति के लिये (इषुध्यति) बाणों को धारण करे, वह (द्युम्नम्) धन को (वृणीत) स्वीकार करे, वैसे हे मनुष्य ! इस सब का अनुष्ठान करके (स्वाहा) सत्क्रिया से तू भी (पुष्यसे) पुष्ट हो ॥८॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। सब मनुष्यों को परमेश्वर की उपासना करके परस्पर मित्रपन का सम्पादन कर, युद्ध में दुष्टों को जीत के, राज्यलक्ष्मी को प्राप्त होकर सुखी रहना चाहिये ॥८॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

मनुष्यैः परमेश्वराश्रयेण किं किं कर्त्तव्यमित्युपदिश्यते ॥

अन्वय:

(विश्वः) सर्वो जनः (देवस्य) सर्वप्रकाशकस्य (नेतुः) सर्वनयनकर्त्तुः परमेश्वरस्य (मर्त्तः) मनुष्यः, मर्त्ता इति मनुष्यनामसु पठितम्। (निघं०२.३) (वुरीत) वृणीयात्, अत्र बहुलं छन्दसि। [अष्टा०२.४.७३] इति विकरणस्य लुक् (सख्यम्) सख्युर्भावः कर्म वा (विश्वः) अखिलः (राये) धनप्राप्तये (इषुध्यति) शरान् धारयेत्, लेट्प्रयोगोऽयम् (द्युम्नम्) धनम् (वृणीत) स्वीकुर्य्यात् (पुष्यसे) पुष्टो भवेः, अत्र व्यत्ययेनात्मनेपदम्, लेट्प्रयोगोऽयम् (स्वाहा) सत्क्रियया। अयं मन्त्रः (शत०३.१.४.१७-२८) व्याख्यातः ॥८॥

पदार्थान्वयभाषाः - यथा विश्वो मर्त्तो नेतुर्देवस्य जगदीश्वरस्य सख्यं वुरीत विश्वो राय इषुध्यति। स द्युम्नं वृणीत, तथा हे मनुष्य ! एतत्सर्वमनुष्ठाय स्वाहा सत्क्रियया त्वमपि पुष्यसे पुष्टो भवेः ॥८॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। सर्वैर्मनुष्यैः परमेश्वरमुपास्य परस्परं मित्रतां कृत्वा युद्धे दुष्टान् विजित्य राजश्रियं प्राप्य सुखयितव्यम् ॥८॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. सर्व माणसांनी परमेश्वराची उपासना करून परस्पर मैत्री करावी व युद्धात शत्रूला जिंकावे आणि लक्ष्मी प्राप्त करून सुखी व्हावे.