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नमो॑ मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्य॒ चक्ष॑से म॒हो दे॒वाय॒ तदृ॒तꣳ स॑पर्यत। दू॒रे॒दृशे॑ दे॒वजा॑ताय के॒तवे॑ दि॒वस्पु॒त्राय॒ सूर्या॑य शꣳसत ॥३५॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

नमः॑। मि॒त्रस्य॑। वरु॑णस्य। चक्ष॑से। म॒हः। दे॒वाय॑। तत्। ऋ॒तम्। स॒प॒र्य्य॒त॒। दू॒रे॒दृश॒ इति॑ दूरे॒ऽदृशे॑। दे॒वजा॑ता॒येति॑ दे॒वऽजा॑ताय। के॒तवे॑। दि॒वः। पु॒त्राय॑। सूर्य्या॑य। श॒ꣳस॒त॒ ॥३५॥

यजुर्वेद » अध्याय:4» मन्त्र:35


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर ईश्वर और सूर्य्य कैसे हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो ! जैसे हम लोग जो (मित्रस्य) सब के सुहृत् (वरुणस्य) श्रेष्ठ (दिवः) प्रकाशस्वरूप परमेश्वर का (ऋतम्) सत्य स्वरूप है, (तत्) उस चेतन की सेवा करते हैं, वैसे तुम भी उस का सेवन सदा (सपर्य्यत) किया करो और जैसे उस (महः) बड़े (दूरेदृशे) दूरस्थित पदार्थों को दिखाने (चक्षसे) सब को देखने (देवजाताय) दिव्य गुणों से प्रसिद्ध (केतवे) विज्ञानस्वरूप (देवाय) दिव्यगुणयुक्त (पुत्राय) पवित्र करनेवाले (सूर्य्याय) चराचरात्मा परमेश्वर को (नमः) नमस्कार करते हैं, वैसे तुम भी (प्रशंसत) उसकी स्तुति किया करो ॥१॥३५॥ हे मनुष्यो ! जो (मित्रस्य) प्रकाश (वरुणस्य) श्रेष्ठ (दिवः) प्रकाशस्वरूप सूर्य्यलोक का (ऋतम्) यथार्थ स्वरूप है, (तत्) उस प्रकाशस्वरूप को तुम भी विद्या से (सपर्य्यत) सेवन किया करो, जैसे हम लोग जिस (चक्षसे) सब के दिखाने (देवजाताय) दिव्य गुणों से प्रसिद्ध (केतवे) ज्ञान कराने, अग्नि के (पुत्राय) पुत्र (दूरेदृशे) दूर स्थित हुए पदार्थों को दिखाने (महः) बड़े (देवाय) दिव्यगुणवाले (सूर्य्याय) सूर्य्य के लिये प्रवृत्त होओ ॥२॥३५॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में श्लेष और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। सब मनुष्यों को जिसकी कृपा वा प्रकाश से चोर डाकू आदि अपने कार्य्यों से निवृत्त हो जाते हैं, उसी की प्रशंसा और गुणों की प्रसिद्धि करनी और परमेश्वर के समान समर्थ वा सूर्य्य के समान कोई लोक नहीं है, ऐसा जानना चाहिये ॥३५॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनरीश्वरसवितारौ कीदृशावित्युपदिश्यते ॥

अन्वय:

(नमः) सत्करणमन्नं वा। नम इत्यन्ननामसु पठितम्। (निघं०२.७) (मित्रस्य) सर्वजगत्सुहृदः प्रकाशस्य वा (वरुणस्य) श्रेष्ठस्य (चक्षसे) सर्वद्रष्टुर्दर्शयितुर्वा। अत्र षष्ठ्यर्थे चतुर्थी०। [अष्टा०भा०वा०२.३.६२] इति वार्त्तिकेन चतुर्थी। चष्ट इति पश्यतिकर्मसु पठितम्। (निघं०३.११) (महः) महसे, अत्र सुपां सुलुग्०। [अष्टा०७.१.३९] इति ङेर्लुक् (देवाय) दिव्यगुणाय (तत्) चेतनस्वरूपं प्रकाशस्वरूपं वा (ऋतम्) सत्यम् (सपर्य्यत) परिचरत। सपर्य्यतीति परिचरणकर्मसु पठितम्। (निघं०३.५) (दूरेदृशे) यो दूरे स्थितान् दर्शयति तस्मै (देवजाताय) देवैर्दिव्यैर्गुणैः प्रसिद्धाय (केतवे) विज्ञानस्वरूपाय ज्ञापकाय वा (दिवः) प्रकाशस्वरूपस्य (पुत्राय) पवित्रकारकायाग्निपुत्राय वा (सूर्य्याय) चराचरात्मने परमैश्वर्य्यहेतवे वा (शꣳसत) प्रशंसत। अयं मन्त्रः (शत०३.३.४.२४) व्याख्यातः ॥३५॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्या ! यथा वयं यन्मित्रस्य वरुणस्य दिव ऋतं सत्यं स्वरूपमस्ति, तद्यूयमपि सपर्य्यत। यस्य महो महसे दूरेदृशे चक्षसे देवजाताय केतवे देवाय पुत्राय पवित्रकर्त्रे सूर्य्याय परमात्मने वयं नमस्कुर्म्मस्तस्मै यूयमपि कुरुतेत्येकः ॥१॥३५॥ हे मनुष्या यथा वयं यन्मित्रस्य वरुणस्य दिवः प्रकाशस्वरूपस्य सूर्य्यलोकस्यर्तं यथार्थं स्वरूपं सेवेमहि, तद्यूयमपि विद्यया सपर्य्यत। यथा वयं यस्मै चक्षसे देवजाताय केतवे दिवोऽग्नेः पुत्राय दूरेदृशे महोदेवाय सूर्य्याय लोकाय प्राप्त्यर्थं प्रवर्त्तेमहि, तथा यूयमपि प्रवर्त्तध्वम् ॥२॥३५॥
भावार्थभाषाः - अत्र श्लेषवाचकलुप्तोपमालङ्कारौ। यस्य कृपया प्रकाशेन वा चोरदस्य्वादयो निवर्त्तन्ते, यतः परमेश्वरेण समः समर्थः सूर्य्येण समो लोकश्च न विद्यते, तस्मात् सर्वैर्मनुष्यैः स एव प्रशंसनीय इति वेद्यम् ॥३५॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात श्लेष व वाचकलुप्तोपमालंकार आहेत. ज्या परमेश्वराची आपल्यावर कृपा आहे, त्याच्यासारखा समर्थ कोणी नाही हे जाणून त्याची माणसांनी प्रशंसा केली पाहिजे. तसेच ज्या सूर्याच्या प्रकाशामुळे चोर, डाकू वगैरे चोरी करू शकत नाहीत त्या सूर्याचे गुण जाणून सूर्यासारखा कोणताही लोक (तारा) नाही हे जाणले पाहिजे.