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चिद॑सि म॒नासि॒ धीर॑सि॒ दक्षि॑णासि क्ष॒त्रिया॑सि य॒ज्ञिया॒स्यदि॑तिरस्युभयतःशी॒र्ष्णी। सा नः॒ सुप्रा॑ची॒ सुप्र॑तीच्येधि मि॒त्रस्त्वा॑ प॒दि ब॑ध्नीतां पू॒षाऽध्व॑नस्पा॒त्विन्द्रा॒याध्य॑क्षाय ॥१९॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

चित्। अ॒सि॒। म॒ना। अ॒सि॒। धीः। अ॒सि॒। दक्षि॑णा। अ॒सि॒। क्ष॒त्रिया॑। अ॒सि॒। य॒ज्ञिया॑। अ॒सि॒। अदि॑तिः। अ॒सि॒। उ॒भ॒य॒तः॒शी॒र्ष्णीत्यु॑भयतःऽशी॒र्ष्णी। सा। नः॒ सुप्रा॒चीति॒ सुऽप्रा॑ची। सुप्र॑ती॒चीति॒ सुऽप्र॑तीची। ए॒धि॒। मि॒त्रः॒। त्वा॒। प॒दि। ब॒ध्नी॒ता॒म्। पू॒षा। अध्व॑नः। पा॒तु॒। इन्द्रा॑य। अध्य॑क्षा॒येत्यधि॑ऽअक्षाय ॥१९॥

यजुर्वेद » अध्याय:4» मन्त्र:19


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वे वाणी और बिजुली किस प्रकार की हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे जगदीश्वर ! (सत्यसवसः) सत्य ऐश्वर्य्ययुक्त (ते) आपके (प्रसवे) उत्पन्न किये संसार में जो (चित्) विद्या व्यवहार को चितानेवाली (असि) है, जो (मना) ज्ञान साधन करानेहारी (असि) है, जो (धीः) प्रज्ञा और कर्म को प्राप्त करनेवाली (असि) है, जो (दक्षिणा) विज्ञान विजय को प्राप्त करने (क्षत्रिया) राजा के पुत्र के समान वर्ताने हारी (असि) है, जो (यज्ञिया) यज्ञ को कराने योग्य (असि) है, जो (उभयतःशीर्ष्णी) दोनों प्रकार से शिर के समान उत्तम गुणयुक्त और (अदितिः) नाशरहित वाणी वा बिजुली (असि) है, (सा) वह (नः) हम लोगों के लिये (सुप्राची) पूर्वकाल और (सुप्रतीची) पश्चिम काल में सुख देने हारी (एधि) हो, जो (पूषा) पुष्टि करने हारा (मित्रः) सब का मित्र होकर मनुष्यपन के लिये (त्वा) उस वाणी और बिजुली को (पदि) प्राप्ति योग्य उत्तम व्यवहार में (अध्यक्षाय) अच्छे प्रकार व्यवहार को देखने (इन्द्राय) परमैश्वर्य्यवाले परमात्मा, अध्यक्ष और श्रेष्ठ व्यवहार के लिये (बध्नीताम्) बन्धनयुक्त करे, सो आप (अध्वनः) व्यवहार और परमार्थ की सिद्धि करनेवाले मार्ग के मध्य में (नः) हम लोगों की निरन्तर (पातु) रक्षा कीजिये ॥१९॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है और पूर्व मन्त्र से (ते, सत्यसवसः, प्रसवे) इन तीन पदों की अनुवृत्ति भी आती है। मनुष्यों को जो बाह्य, आभ्यन्तर की रक्षा करके सब से उत्तम वाणी वा बिजुली वर्त्तती है, वही भूत, भविष्यत् और वर्त्तमान काल में सुख की करानेवाली है, ऐसा जानना चाहिये। जो कोई मनुष्य प्रीति से परमेश्वर, सभाध्यक्ष और उत्तम कामों में आज्ञा के पालन के लिये सत्य वाणी और उत्तम विद्या को ग्रहण करता है, वही सब की रक्षा कर सकता है ॥१९॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्ते कीदृश्यावित्युपदिश्यते ॥

अन्वय:

(चित्) या विद्याव्यवहारस्य चेतयमाना वाग्विद्युद् वा (असि) अस्ति। अत्र सर्वत्र व्यत्ययः (मना) ज्ञानसाधिका (असि) अस्ति (धीः) प्रज्ञाकर्मविद्याधारिका (असि) अस्ति (दक्षिणा) दक्षन्ते प्राप्नुवन्ति विज्ञानं विजयं च यया सा (असि) अस्ति (क्षत्रिया) या क्षत्रस्यापत्यवद् वर्त्तते (असि) अस्ति (यज्ञिया) या यज्ञमर्हति सा (असि) अस्ति (अदितिः) अविनाशिनी (असि) अस्ति (उभयतःशीर्ष्णी) उभयतः शिरोवदुत्तमा गुणा यस्यां सा। अत्र पञ्चम्या अलुक् (सा) (नः) अस्मभ्यम् (सुप्राची) शोभनः प्राक् पूर्वः कालो यस्यां सा (सुप्रतीची) सुष्ठु प्रत्यक् पश्चिमः कालो यस्यां सा (एधि) भवतु (मित्रः) सखा (त्वा) ताम् (पदि) पद्यते जानाति प्राप्नोति येन व्यवहारेण तस्मिन्। अत्र कृतो बहुलम्। [अष्टा०भा०वा०३.३.११३] इति करणे क्विप् (बध्नीताम्) बद्धां कुरुताम् (पूषा) पुष्टिकर्त्ता (अध्वनः) मार्गस्य मध्ये (पातु) रक्षतु (इन्द्राय) परमैश्वर्य्यवते परमेश्वराय स्वामिने व्यवहाराय वा (अध्यक्षाय) अधिरुपरिभावेऽन्वेक्षणेऽक्षाण्यक्षिणी वा यस्य यस्माद् वा तस्मै। अयं मन्त्रः (शत०३.२.४.१६-२०) व्याख्यातः ॥१९॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे जगदीश्वर ! सत्यसवस्ते तव प्रसवे या वाग् विद्युद्वा चिदस्ति मना अस्ति धीरस्ति दक्षिणास्ति क्षत्रियास्ति यज्ञियास्त्युभयतः शीर्ष्ण्यादितिरस्ति सा नोऽस्मभ्यं सुप्राची सुप्रतीच्येधि भवतु। यः पूषा मित्रः सर्वसखा भूत्वा मनुष्यत्वाय त्वां पद्यध्यक्षायेन्द्राय बध्नीताम्। स भवानध्वनो व्यवहारपरमार्थसिद्धिकरस्य मार्गस्य मध्ये नोऽस्मान् सततं पातु रक्षतु ॥१९॥
भावार्थभाषाः - अत्र श्लेषालङ्कारः। ते, सत्यसवसः, प्रसवे−इति पदत्रयमत्रानुवर्त्तते। या बाह्याभ्यन्तररक्षणाभ्यां सर्वोत्तमा वाग् विद्युच्च वर्त्तते, सैषा भूतभविष्यद्वर्त्तमानकालेषु सुखकारिण्यस्तीति वेद्यम्। यः कश्चित् परमेश्वरसभा- ध्यक्षोत्तमव्यवहारसिद्धिप्रीत्याज्ञापालनाय सत्यां वाचं विद्युद्विद्यां च दृढां निबध्नाति, स एव मनुष्यः सर्वरक्षको भवतीति ॥१९॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात श्लेषालंकार आहे. पूर्वीच्या मंत्रातील (ते) (सत्यसवसः) (प्रसवे) या तीन पदांची अनुवृत्ती झालेली आहे. बाह्य व आभ्यंतर यांचे रक्षण करणारी सर्वात उत्तम वाणी किंवा विद्युत असते व तीच भूत, वर्तमान व भविष्यकाळात सुखी करणारी असते हे माणसांनी जाणले पाहिजे. जो माणूस चांगले कर्म करताना परमेश्वर व राजा यांची आज्ञा पालन करून सत्यवाणी व उत्तम विद्या संपादन करतो तोच सर्वांचे रक्षण करू शकतो.