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प्रैतु॒ ब्रह्म॑ण॒स्पतिः॒ प्र दे॒व्ये᳖तु सू॒नृता॑। अच्छा॑ वी॒रं नर्यं॑ प॒ङ्क्तिरा॑धसं दे॒वा य॒ज्ञं न॑यन्तु नः। म॒खाय॑ त्वा म॒खस्य॑ त्वा शी॒र्ष्णे। म॒खाय॑ त्वा म॒खस्य॑ त्वा शी॒र्ष्णे। म॒खाय॑ त्वा म॒खस्य॑ त्वा शी॒र्ष्णे ॥७ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्र। ए॒तु॒। ब्रह्म॑णः। पतिः॑। प्र। दे॒वी। ए॒तु॒। सू॒नृता॑। अच्छ॑। वी॒रम्। नर्य्य॑म्। प॒ङ्क्तिरा॑धस॒मिति॑ प॒ङ्क्तिऽरा॑धसम्। दे॒वाः। य॒ज्ञम्। न॒य॒न्तु॒। नः॒ ॥ म॒खाय॑। त्वा॒। म॒खस्य॑। त्वा॒। शी॒र्ष्णे। म॒खाय॑। त्वा॒। म॒खस्य॑। त्वा॒ शी॒र्ष्णे। म॒खाय॑। त्वा॒। म॒खस्य॑। त्वा॒ शी॒र्ष्णे ॥७ ॥

यजुर्वेद » अध्याय:37» मन्त्र:7


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

स्त्री-पुरुष कैसे हों, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे विद्वन् ! जिस (वीरम्) सब दुःखों को हटानेवाले (नर्य्यम्) मनुष्यों में उत्तम (पङ्क्तिराधसम्) समुदायों को सिद्ध करनेवाले (यज्ञम्) सुखप्राप्ति के हेतु जन को (देवाः) विद्वान् लोग (नः) हमको (नयन्तु) प्राप्त करें (ब्रह्मणः, पतिः) धन का रक्षक जन (प्र, एतु) प्रकर्षता से प्राप्त हो (सूनृता) सत्य बोलना आदि सुशीलतावाली (देवी) विदुषी स्त्री (अच्छ) (प्र, एतु) अच्छे प्रकार प्राप्त होवे उस (त्वा) तुझको (मखाय) विद्यावृद्धि के लिये (मखस्य) सुख रक्षा के (शीर्ष्णे) उत्तम अवयव के लिये (त्वा) आपको (मखाय) धर्माचरण निमित्त के लिये (त्वा) आपके (मखस्य) धर्मरक्षा के (शीर्ष्णे) उत्तम अवयव के लिये (त्वा) आपको (मखाय) सब सुख करनेवाले के लिये (त्वा) आपको (मखस्य) सब सुख बढ़ानेवाले के सम्बन्धी (शीर्ष्णे) उत्तम सुखदायी जन के लिये (त्वा) आपका आश्रय करें ॥७ ॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य और जो स्त्रियाँ स्वयं विद्यादि गुणों को पाकर अन्यों को प्राप्त कराके विद्या, सुख और धर्म की वृद्धि के लिये अधिक सुशिक्षित जनों को विद्वान् करते हैं, वे पुरुष और स्त्रियाँ निरन्तर आनन्दित होते हैं ॥७ ॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

स्त्रीपुरुषाः कीदृशाः स्युरित्याह ॥

अन्वय:

(प्र) (एतु) प्राप्नोतु (ब्रह्मणः) धनस्य (पतिः) पालकः (प्र) (देवी) विदुषी (एतु) (सूनृता) सत्यभाषणादिसुशीलतायुक्ता (अच्छ) अत्र निपातस्य च [अ०६.३.१३६] इति दीर्घः। (वीरम्) सर्वदुःखप्रक्षेप्तारम् (नर्यम्) नृषु साधुम् (पङ्क्तिराधसम्) यः पङ्क्तीः समुदायान् राध्नोति तम् (देवाः) विद्वांसः (यज्ञम्) सुखसङ्गमकम् (नयन्तु) प्रापयन्तु (नः) अस्मान् (मखाय) विद्यावृद्धये (त्वा) त्वाम् (मखस्य) सुखरक्षणस्य (त्वा) (शीर्ष्णे) शिरोवद्वर्त्तमानाय (मखाय) धर्माचरणनिमित्ताय (त्वा) (मखस्य) धर्मरक्षणस्य (त्वा) (शीर्ष्णे) (मखाय) सर्वसुखकराय (त्वा) (मखस्य) सुखवर्द्धकस्य (त्वा) (शीर्ष्णे) उत्तमसुखप्रदाय ॥७ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे विद्वन् ! यं वीरं नर्य्यं पङ्क्तिराधसं यज्ञं देवा नोऽस्मान्नयन्तु ब्रह्मणस्पतिः प्रैतु सूनृता देव्यच्छ प्रैतु तं मखाय त्वा मखस्य शीर्ष्णे त्वा मखाय त्वा मखस्य शीर्ष्णे त्वा मखाय त्वा मखस्य शीर्ष्णे त्वा वयमाश्रयेम ॥७ ॥
भावार्थभाषाः - ये मनुष्या याः स्त्रियश्च स्वयं विद्यादिगुणान् प्राप्यान्यान् प्रापय्य विद्यासुखधर्मवृद्धयेऽधिकान् सुशिक्षितान् विदुषः कुर्वन्ति, ते तांश्च सततमानन्दन्ति ॥७ ॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जे पुरुष व स्रिया स्वतः विद्या वगैरे गुण प्राप्त करून इतरांनाही शिकवितात व विद्या, सुख आणि धर्म वाढविण्यासाठी सुशिक्षित लोकांना विद्वान करतात ते स्री-पुरुष सतत आनंदी असतात.