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शन्नो॑ दे॒वीर॒भिष्ट॑य॒ऽआपो॑ भवन्तु पी॒तये॑। शंयोर॒भि स्र॑वन्तु नः ॥१२ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

शम्। नः॒। दे॒वीः। अ॒भिष्ट॑ये। आपः॑। भ॒व॒न्तु॒। पी॒तये॑ ॥ शंयोः। अ॒भि। स्र॒व॒न्तु॒। नः॒ ॥१२ ॥

यजुर्वेद » अध्याय:36» मन्त्र:12


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

कैसे मनुष्य सुखों से युक्त होते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे जगदीश्वर वा विद्वन् ! जैसे (अभिष्टये) इष्ट सुख की सिद्धि के लिये (पीतये) पीने के अर्थ (देवीः) दिव्य उत्तम (आपः) जल (नः) हमको (शम्) सुखकारी (भवन्तु) होवें (नः) हमारे लिये (शंयोः) सुख की वृष्टि (अभि, स्रवन्तु) सब ओर से करें, वैसे उपदेश करो ॥१२ ॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य यज्ञादि से शुद्ध जलादि पदार्थों का सेवन करते हैं, उन पर सुखरूप अमृत की वर्षा निरन्तर होती है ॥१२ ॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

कीदृशा जनाः सुखसम्पन्ना भवन्तीत्याह ॥

अन्वय:

(शम्) (नः) अस्मभ्यम् (देवीः) दिव्याः (अभिष्टये) इष्टसुखसिद्धये (आपः) जलानि (भवन्तु) (पीतये) पानाय (शंयोः) सुखस्य (अभि) सर्वतः (स्रवन्तु) वर्षन्तु (नः) अस्मभ्यम् ॥१२ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे जगदीश्वर विद्वन्वा ! यथाऽभिष्टये पीतये देवीरापो नः शं भवन्तु, नः शंयोर्वृष्टिमभिस्रवन्तु, तथोपदिशतम् ॥१२ ॥
भावार्थभाषाः - ये यज्ञादिना शुद्धान् जलादिपदार्थान् सेवन्ते, तेषामुपरि सुखामृतस्य वृष्टिः सततं भवति ॥१२ ॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जी माणसे यज्ञ करून जल वगैरे पदार्थ शुद्ध करून त्यांचा स्वीकार करतात. त्यांच्यावर सदैव सुखरूपी अमृताची वृष्टी होते.