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श्राय॑न्तऽइव॒ सूर्य्यं॒ विश्वेदिन्द्र॑स्य भक्षत। वसू॑नि जा॒ते जन॑मान॒ऽओज॑सा॒ प्रति॑ भा॒गं न दी॑धिम ॥४१ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

श्राय॑न्तऽइ॒वेति॒ श्राय॑न्तःऽइव। सूर्य॑म्। विश्वा॑। इत्। इन्द्र॑स्य। भ॒क्ष॒त॒ ॥ वसू॒नि। जा॒ते। जन॑माने। ओज॑सा। प्रति॑। भा॒गम्। न। दी॒धि॒म॒ ॥४१ ॥

यजुर्वेद » अध्याय:33» मन्त्र:41


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो ! जैसे हम लोग (ओजसा) सामर्थ्य से (जाते) उत्पन्न हुए और (जनमाने) उत्पन्न होनेवाले जगत् में (सूर्यम्) स्वयं प्रकाशस्वरूप सबके अन्तर्यामी परमेश्वर का (श्रायन्तइव) आश्रय करते हुए के समान (विश्वा) सब (वसूनि) वस्तुओं को (प्रति, दीधिम) प्रकाशित करें और (भागम्, न) सेवने योग्य अपने अंश के तुल्य सेवन करें, वैसे (इत्) ही (इन्द्रस्य) उत्तम ऐश्वर्य के भाग को तुम लोग (भक्षत) सेवन करो ॥४१ ॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो हम लोग परमेश्वर को सेवन करते हुए विद्वानों के तुल्य हों तो यहाँ सब ऐश्वर्य को प्राप्त होवें ॥४१ ॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

अन्वय:

(श्रायन्तइव) समाश्रयन्तइव। अत्र गुणे प्राप्ते व्यत्ययेन वृद्धिः। (सूर्य्यम्) स्वप्रकाशं सर्वात्मानं जगदीश्वरम् (विश्वा) सर्वाणि (इत्) एव (इन्द्रस्य) परमैश्वर्यस्य (भक्षत) सेवध्वम् (वसूनि) वस्तूनि (जाते) उत्पन्ने (जनमाने) उत्पद्यमाने। अत्र विकरणव्यत्ययः। (ओजसा) सामर्थ्येन (प्रति) (भागम्) सेवनीयमंशम् (न) इव (दीधिम) प्रकाशयेम ॥४१ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्याः ! यथा वयमोजसा जाते जनमाने च जगति सूर्यं श्रायन्तइव विश्वा वसूनि प्रति दीधिम भागं न सेवेमहि तथेदिन्द्रस्येमं यूयं भक्षत ॥४१ ॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमालङ्कारः। यदि वयं परमेश्वरं सेवमाना विद्वांस इव भवेम तर्हीह सर्वमैश्वर्यं लभेमहि ॥४१ ॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. सर्वांनी परमेश्वरावर विश्वास ठेवून विद्वानांप्रमाणे वागल्यास ऐश्वर्य प्राप्त होऊ शकते.