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यऽइ॒मे द्यावा॑पृथि॒वी जनि॑त्री रू॒पैरपि॑ꣳश॒द् भुव॑नानि॒ विश्वा॑। तम॒द्य हो॑तरिषि॒तो यजी॑यान् दे॒वं त्वष्टा॑रमि॒ह य॑क्षि वि॒द्वान् ॥३४ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यः। इ॒मेऽइती॒मे। द्यावा॑पृथि॒वीऽइति॒ द्यावा॑पृथि॒वी। जनि॑त्री॒ऽइति॒ जनि॑त्री। रू॒पैः। अपि॑ꣳशत्। भुव॑नानि। विश्वा॑। तम्। अ॒द्य। हो॒तः॒। इ॒षि॒तः। यजी॑यान्। दे॒वम्। त्वष्टा॑रम्। इ॒ह। य॒क्षि॒। वि॒द्वान् ॥३४ ॥

यजुर्वेद » अध्याय:29» मन्त्र:34


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (होतः) ग्रहण करनेवाले जन ! (यः) जो (यजीयान्) अतिसमागम करनेवाला (इषितः) प्रेरणा किया हुआ (विद्वान्) सब ओर से विद्या को प्राप्त विद्वान् जैसे ईश्वर (इह) इस व्यवहार में (रूपैः) चित्र-विचित्र आकारों से (इमे) इन (जनित्री) अनेक कार्यों को उत्पन्न करनेवाली (द्यावापृथिवी) बिजुली और पृथिवी आदि (विश्वा) सब (भुवनानि) लोकों को (अपिंशत्) अवयवरूप करता है, वैसे (तम्) उस (त्वष्टारम्) वियोग-संयोग अर्थात् प्रलय उत्पत्ति करनेहारे (देवम्) ईश्वर का (अद्य) आज तू (यक्षि) सङ्ग करता है, इससे सत्कार करने योग्य है ॥३४ ॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को इस सृष्टि में परमात्मा की रचनाओं की विशेषताओं को जान के वैसे ही शिल्पविद्या का प्रयोग करना चाहिए ॥३४ ॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

अन्वय:

(यः) विद्वान् (इमे) प्रत्यक्षे (द्यावापृथिवी) विद्युद्भूमी (जनित्री) अनेककार्योत्पादिके (रूपैः) विचित्राभिराहुतिभिः (अपिंशत्) अवयवयति (भुवनानि) लोकान् (विश्वा) विश्वानि सर्वान् (तम्) (अद्य) इदानीम् (होतः) आदातः (इषितः) प्रेरितः (यजीयान्) अतिशयेन यष्टा सङ्गन्ता (देवम्) (त्वष्टारम्) वियोगसंयोगादिकर्त्तारम् (इह) अस्मिन् व्यवहारे (यक्षि) सङ्गच्छसे (विद्वान्) सर्वतो विद्याप्तः ॥३४ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे होतर्यो यज्ञीयानिषितो विद्वान् यथेश्वर इह रूपैरिमे जनित्री द्यावापृथिवी विश्वा भुवनान्यपिंशत् तथा तं त्वष्टारं देवमद्य त्वं यक्षि, तस्मात् सत्कर्त्तव्योऽसि ॥३४ ॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। मनुष्यैरस्यां सृष्टौ परमात्मनो रचनाविशेषान् विज्ञाय तथैव शिल्पविद्या संप्रयोज्या ॥३४ ॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. माणसांनी या जगात परमेश्वर निर्मित सृष्टीची विशेषतः जाणून त्याप्रमाणे (हस्तक्रिया) शिल्पविद्येचा वापर केला पाहिजे.