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ताऽउ॒भौ च॒तुरः॑ प॒दः स॒म्प्रसा॑रयाव स्व॒र्गे लो॒के प्रोर्णु॑वाथां॒ वृषा॑ वा॒जी रे॑तो॒धा रेतो॑ दधातु ॥२० ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

तौ। उ॒भौ। च॒तुरः॑। प॒दः। स॒म्प्रसा॑रया॒वेति॑ स॒म्ऽप्रसा॑रयाव। स्व॒र्ग इति॑ स्वः॒ऽगे। लो॒के। प्र। ऊ॒र्णु॒वा॒था॒म्। वृषा॑। वा॒जी। रे॒तो॒धा इति॑ रेतः॒ऽधाः। रेतः॑। द॒धा॒तु॒ ॥२० ॥

यजुर्वेद » अध्याय:23» मन्त्र:20


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब राजा और प्रजाजन परस्पर कैसे वर्त्तें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे राजाप्रजाजनो ! तुम (उभौ) दोनों (तौ) प्रजा राजाजन जैसे (स्वर्गे) सुख से भरे हुए (लोके) देखने योग्य व्यवहार वा पदार्थ में (चतुरः) चारों धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष (पदः) जो कि पाने योग्य हैं, उनको (प्रोर्णुवाथाम्) प्राप्त होओ, वैसे इन का हम अध्यापक और उपदेशक दोनों (संप्रसारयाव) विस्तार करें, जैसे (रेतोधाः) आलिङ्गन अर्थात् दूसरे से मिलने को धारण करने और (वृषा) दुष्टों के सामर्थ्य को बाँधने अर्थात् उन की शक्ति को रोकने हारा (वाजी) विशेष ज्ञानवान् राजा प्रजाजनों में (रेतः) अपने पराक्रम को स्थापन करे, वैसे प्रजाजन (दधातु) स्थापना करें ॥२० ॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजा-प्रजा पिता और पुत्र के समान अपना वर्त्ताव वर्त्तें तो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष फल की सिद्धि को यथावत् प्राप्त हों, जैसे राजा प्रजा के सुख और बल को बढ़ावें, वैसे प्रजा भी राजा के सुख और बल की उन्नति करे ॥२० ॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथ राजप्रजाजनाः परस्परं कथं वर्त्तेरन्नित्याह ॥

अन्वय:

(तौ) प्रजाराजानौ (उभौ) (चतुरः) धर्मार्थकाममोक्षान् (पदः) प्राप्तव्यान् (संप्रसारयाव) विस्तारयावः (स्वर्गे) सुखमये (लोके) द्रष्टव्ये (प्र) (ऊर्णुवाथाम्) प्राप्नुयाथाम् (वृषा) दुष्टानां शक्तिबन्धकः (वाजी) विज्ञानवान् (रेतोधाः) यो रेतः श्लेषमालिङ्गनं दधाति सः (रेतः) वीर्यं पराक्रमम् (दधातु) ॥२० ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे राजप्रजे ! युवां उभौ तौ यथा स्वर्गे लोके चतुरः पदः प्रोर्णुवाथां तथैतानावामध्यापकोपदेशकौ संप्रसारयाव, यथा रेतोधा वृषा वाजी राजा प्रजासु रेतो वीर्यं दध्यात्तथा प्रजापि दधातु ॥२० ॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यदि राजप्रजे पितापुत्रवद् वर्त्तेयातां तर्हि धर्मार्थकाममोक्षफलसिद्धिं यथावत्प्राप्नुयातां, यथा राजा प्रजासुखबले वर्द्धयेत्तथा प्रजा अपि राज्ञः सुखबले उन्नयेत्॥२० ॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जो राजा प्रजेबरोबर पिता व पुत्र यांच्याप्रमाणे आपली वागणूक ठेवतो तो धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष प्राप्त करतो. जसा राजा प्रजेचे सुख व बळ वाढवितो तसे प्रजेनेही राजाचे सुख व बल वाढवावे.