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कृष्णो॑ऽस्याखरे॒ष्ठो᳕ऽग्नये॑ त्वा॒ जुष्टं॒ प्रोक्षा॑मि॒ वेदि॑रसि ब॒र्हिषे॑ त्वा॒ जुष्टां॒ प्रोक्षा॑मि ब॒र्हिर॑सि स्रु॒ग्भ्यस्त्वा॒ जुष्टं॒ प्रोक्षा॒मि ॥१॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

कृष्णः॑। अ॒सि॒। आ॒ख॒रे॒ष्ठः। आ॒ख॒रे॒स्थ इत्या॑खरे॒ऽस्थः। अ॒ग्नये॑। त्वा॒। जुष्ट॑म्। प्र। उ॒क्षा॒मि॒। वेदिः॑। अ॒सि॒। ब॒र्हिषे॑। त्वा॒। जुष्टा॑म्। प्र। उ॒क्षा॒मि॒। ब॒र्हिः। अ॒सि॒। स्रु॒ग्भ्य इति स्रु॒क्ऽभ्यः। त्वा॒। जुष्ट॑म्। प्र। उ॒क्षा॒मि॒ ॥१॥

यजुर्वेद » अध्याय:2» मन्त्र:1


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब दूसरे अध्याय में परमेश्वर ने उन विद्याओं की सिद्धि करने के लिये विशेष विद्याओं का प्रकाश किया है कि जो-जो प्रथम अध्याय में प्राणियों के सुख के लिये प्रकाशित की हैं। उन में से वेद आदि पदार्थों के बनाने को हस्तक्रियाओं के सहित विद्याओं के प्रकार प्रकाशित किये हैं, उन में से प्रथम मन्त्र में यज्ञ सिद्ध करने के लिये साधन अर्थात् उनकी सिद्धि के निमित्त कहे हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - जिस कारण यह यज्ञ (आखरेष्ठः) वेदी की रचना से खुदे हुए स्थान में स्थिर होकर (कृष्णः) भौतिक अग्नि से छिन्न अर्थात् सूक्ष्मरूप और पवन के गुणों से आकर्षण को प्राप्त (असि) होता है, इससे मैं (अग्नये) भौतिक अग्नि के बीच में हवन करने के लिये (जुष्टम्) प्रीति के साथ शुद्ध किये हुए (त्वा) उस यज्ञ अर्थात् होम की सामग्री को (प्रोक्षामि) घी आदि पदार्थों से सींचकर शुद्ध करता हूँ और जिस कारण यह (वेदिः) वेदी अन्तरिक्ष में स्थित (असि) होती है, इससे मैं (बर्हिषे) होम किये हुए पदार्थों को अन्तरिक्ष में पहुँचाने के लिये (जुष्टाम्) प्रीति से सम्पादन की हुई (त्वा) उस वेदि को (प्रोक्षामि) अच्छे प्रकार घी आदि पदार्थों से सींचता हूँ तथा जिस कारण यह (बर्हिः) जल अन्तरिक्ष में स्थिर होकर पदार्थों की शुद्धि करानेवाला (असि) होता है, इससे (त्वा) उसकी शुद्धि के लिये जो कि शुद्ध किया हुआ (जुष्टम्) पुष्टि आदि गुणों को उत्पन्न करनेहारा हवि है, उसको मैं (स्रुग्भ्यः) स्रुवा आदि साधनों से अग्नि में डालने के लिये (प्रोक्षामि) शुद्ध करता हूँ ॥१॥
भावार्थभाषाः - ईश्वर उपदेश करता है कि सब मनुष्यों को वेदी बनाकर और पात्र आदि होम की सामग्री ले के उस हवि को अच्छी प्रकार शुद्ध कर तथा अग्नि में होम कर के किया हुआ यज्ञ वर्षा के शुद्ध जल से सब ओषधियों को पुष्ट करता है, उस यज्ञ के अनुष्ठान से सब प्राणियों को नित्य सुख देना मनुष्यों का परम धर्म है ॥१॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

तत्रादौ वेद्यादिरचनमुपदिश्यते ॥

अन्वय:

(कृष्णः) अग्निना छिन्नो वायुनाऽकर्षितो यज्ञः (असि) भवति। अत्र सर्वत्र व्यत्ययः (आखरेष्ठः) समन्तात् खनति यं तस्मिन् तिष्ठतीति सः। खनोडडरेकेकवकाः (अष्टा०३.३.१२५) अनेन वार्तिकेनाऽऽखरः सिध्यति (अग्नये) हवनार्थाय (त्वा) तद्धविः (जुष्टम्) प्रीत्या संशोधितम् (प्रोक्षामि) शोधितेन घृतादिनाऽऽर्द्रीकरोमि (वेदिः) विन्दति सुखान्यनया सा (असि) भवति (बर्हिषे) अन्तरिक्षगमनाय। बर्हिरित्यन्तरिक्षनामसु पठितम् (निघं०१.३) (त्वा) तां वेदिम् (जुष्टाम्) प्रीत्या संपादिताम् (प्रोक्षामि) प्रकृष्टतया घृतादिना सिञ्चामि (बर्हिः) शुद्धमुदकम्। बर्हिरित्युदकनामसु पठितम् (निघं०१.१२) (असि) भवति (स्रुग्भ्यः) स्रावयन्ति गमयन्ति हविर्येभ्यस्तेभ्यः। अत्र स्रु गतावित्यस्मात्। चिक् च (उणा०२.६१) अनेन चिक् प्रत्ययः (त्वा) तत् (जुष्टम्) पुष्ट्यादिगुणयुक्तं जलं पवनं वा (प्रोक्षामि) शोधयामि ॥ अयं मन्त्रः (शत०१.३.३.१-३) व्याख्यातः ॥१॥

पदार्थान्वयभाषाः - यतोऽयं यज्ञ आखरेष्ठः कृष्णो[ऽसि] भवति तस्मात् त्वा तमहमग्नये जुष्टं प्रोक्षामि। यत इयं वेदिरन्तरिक्षस्थासि भवति, तस्मादहं त्वा तामिमां बर्हिषे जुष्टां प्रोक्षामि। यत इदं बर्हिरुदकमन्तरिक्षस्थं सच्छुद्धिकारि [असि] भवति, तस्मात् त्वा तच्छोधितं जुष्टं हविः स्रुग्भ्योऽहं प्रोक्षामि ॥१॥
भावार्थभाषाः - ईश्वर उपदिशति सर्वैर्मनुष्यैर्वेदिं रचयित्वा पात्रादिसामग्रीं गृहीत्वा सम्यक् शोधयित्वा तद्धविरग्नौ हुत्वा कृतो यज्ञः शुद्धेन वृष्टिजलेन सर्वा ओषधीः पोषयति। तेन सर्वे प्राणिनो नित्यं सुखयितव्या इति ॥१॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - ईश्वराच्या उपदेशाप्रमाणे सर्व माणसांनी वेदी बनवावी. पात्रे व होमाचे सामान घ्यावे, शुद्ध आहुतीने होम करावा. अशा यज्ञामुळे पर्जन्याची शुद्धी होते. औषधी पुष्ट होतात व अशा यज्ञाच्या अनुष्ठानाने सर्व प्राण्यांना सदैव सुखी करणे हाच माणसाचा श्रेष्ठ धर्म आहे.