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कु॒म्भो व॑नि॒ष्ठुर्ज॑नि॒ता शची॑भि॒र्यस्मि॒न्नग्रे॒ योन्यां॒ गर्भो॑ऽअ॒न्तः। प्ला॒शिर्व्य॑क्तः श॒तधा॑र॒ऽउत्सो॑ दु॒हे न कु॒म्भी स्व॒धां पि॒तृभ्यः ॥८७ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

कु॒म्भः। व॒नि॒ष्ठुः। ज॒नि॒ता। शची॑भिः। यस्मि॑न्। अग्रे॑। योन्या॑म्। गर्भः॑। अ॒न्तरित्य॒न्तः। प्ला॒शिः। व्य॑क्त॒ इति॒ विऽअ॑क्तः। श॒तधा॑र॒ इति॑ श॒तऽधा॑रः। उत्सः॑। दु॒हे। न। कु॒म्भी। स्व॒धाम्। पि॒तृभ्य॒ इति॑ पि॒तृऽभ्यः॑ ॥८७ ॥

यजुर्वेद » अध्याय:19» मन्त्र:87


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

स्त्री-पुरुष कैसे हों, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - जो (कुम्भः) कलश के समान वीर्यादि धातुओं से पूर्ण (वनिष्ठुः) सम विभाग हरनेहारा (जनिता) सन्तानों का उत्पादक (प्लाशिः) अच्छे प्रकार भोजन का करनेवाला (व्यक्तः) विविध पुष्टियों से प्रसिद्ध (शचीभिः) उत्तम कर्मों करके (शतधारः) सैकड़ों वाणियों से युक्त (उत्सः) जिससे गीला किया जाता है, उस कूप के समान (दुहे) पूर्त्ति करनेहारे व्यवहार में स्थित के (न) समान पुरुष और जो (कुम्भी) कुम्भी के सदृश स्त्री है, इन दोनों को योग्य है कि (पितृभ्यः) पितरों को (स्वधाम्) अन्न देवें और (यस्मिन्) जिस (अग्रे) नवीन (योन्याम्) गर्भाशय के (अन्तः) बीच (गर्भः) गर्भ धारण किया जाता, उसकी निरन्तर रक्षा करें ॥८७ ॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। स्त्री और पुरुष वीर्यवाले पुरुषार्थी होकर अन्नादि से विद्वान् को प्रसन्न कर, धर्म से सन्तानों की उत्पत्ति करें ॥८७ ॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

दम्पती कीदृशावित्याह ॥

अन्वय:

(कुम्भः) कलश इव वीर्यादिधातुभिः पूर्णः (वनिष्ठुः) सम्भाजी। अत्र वन् सम्भक्तावित्यस्मादौणादिक इष्ठुप् प्रत्ययः। (जनिता) उत्पादकः (शचीभिः) कर्मभिः (यस्मिन्) (अग्रे) पुरा (योन्याम्) गर्भाधारे (गर्भः) (अन्तः) अभ्यन्तरे (प्लाशिः) यः प्रकृष्टतयाऽश्नुते सः (व्यक्तः) विविधाभिः पुष्टिभिः प्रसिद्धः (शतधारः) शतशो धारा वाचो यस्य स (उत्सः) उन्दन्ति यस्मात् स कूप इव (दुहे) प्रपूर्त्तिकरे व्यवहारे (न) इव (कुम्भी) धान्याधारा (स्वधाम्) अन्नम् (पितृभ्यः) पालकेभ्यः ॥८७ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - यः कुम्भो वनिष्ठुर्जनिता प्लाशिर्व्यक्तः शचीभिः शतधार उत्सो दुहे न पुरुषो या च कुम्भीव स्त्री तौ पितृभ्यः स्वधां प्रदद्याताम्, यस्मिन्नग्रे योन्यामन्तर्गर्भो धीयते, तं सततं रक्षेताम् ॥८७ ॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमालङ्कारः। स्त्रीपुरुषौ वीर्यवन्तौ पुरुषार्थिनौ भूत्वा अन्नादिभिर्विद्वांसं सन्तोष्य धर्मेण सन्तानोत्पत्तिं कुर्याताम् ॥८७ ॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमालंकार आहे. स्री-पुरुषांनी वीर्यवान व पुरुषार्थी बनावे. अन्न वगैरेनी विद्वानांना प्रसन्न करून धर्माने संतान उत्पन्न करावीत.