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मि॒त्रश्च॑ म॒ऽइन्द्र॑श्च मे॒ वरु॑णश्च म॒ऽइन्द्र॑श्च मे धा॒ता च॑ म॒ऽइन्द्र॑श्च मे॒ त्वष्टा॑ च म॒ऽइन्द्र॑श्च मे म॒रुत॑श्च म॒ऽइन्द्र॑श्च मे विश्वे॑ च मे दे॒वाऽइन्द्र॑श्च मे य॒ज्ञेन॑ कल्पन्ताम् ॥१७ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

मि॒त्रः। च॒। मे॒। इन्द्रः॑। च॒। मे॒। वरु॑णः। च॒। मे। इन्द्रः॑। च॒। मे॒। धा॒ता। च॒। मे॒। इन्द्रः॑। च॒। मे॒। त्वष्टा॑। च॒। मे॒। इन्द्रः॑। च॒। मे॒। म॒रुतः। च॒। मे॒। इन्द्रः॑। च॒। मे॒। विश्वेः॑। च॒। मे॒। दे॒वाः। इन्द्रः॑। च॒। मे॒। य॒ज्ञेन॑। क॒ल्प॒न्ता॒म् ॥१७ ॥

यजुर्वेद » अध्याय:18» मन्त्र:17


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (मे) मेरा (मित्रः) प्राण अर्थात् हृदय में रहनेवाला पवन (च) और समान नाभिस्थ पवन (मे) मेरा (इन्द्रः) बिजुलीरूप अग्नि (च) और तेज (मे) मेरा (वरुणः) उदान अर्थात् कण्ठ में रहनेवाला पवन (च) और समस्त शरीर में विचरने हारा पवन (मे) मेरा (इन्द्रः) सूर्य (च) और धारणाकर्षण (मे) मेरा (धाता) धारण करनेहारा (च) और धीरज (मे) मेरा (इन्द्रः) परम ऐश्वर्य का प्राप्त करानेवाला (च) और न्याययुक्त पुरुषार्थ (मे) मेरा (त्वष्टा) पदार्थों को छिन्न-भिन्न करनेवाला अग्नि (च) और शिल्प अर्थात् कारीगरी (मे) मेरा (इन्द्रः) शत्रुओं को विदीर्ण करनेहारा राजा (च) तथा कारीगरी (मे) मेरे (मरुतः) इस ब्रह्माण्ड में रहनेवाले अन्य पवन (च) और शरीर के धातु (मे) मेरी (इन्द्रः) सर्वत्र व्यापक बिजुली (च) और उसका काम (मे) मेरे (विश्वे) समस्त पदार्थ (च) और सर्वस्व (देवाः) उत्तम गुणयुक्त पृथिवी आदि (मे) मेरे लिये (इन्द्रः) परम ऐश्वर्य का दाता (च) और उसका उपयोग ये सब (यज्ञेन) पवन की विद्या के विधान करने से (कल्पन्ताम्) समर्थ होवें ॥१७ ॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य प्राण और बिजुली की विद्या को जान और इनकी सब जगह सब ओर से व्याप्ति को जानकर अपने बहुत [दीर्घ] जीवन को सिद्ध करें ॥१७ ॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

अन्वय:

(मित्रः) प्राणः (च) समानः (मे) (इन्द्रः) विद्युत् (च) तेजः (मे) (वरुणः) उदानः। प्राणोदानौ मित्रावरुणौ ॥ (शत०१.८.३.१२) (च) व्यानः (मे) (इन्द्रः) सूर्य्यः (च) धृतिः (मे) (धाता) धर्त्ता (च) धैर्य्यम् (मे) (इन्द्रः) परमैश्वर्य्यप्रापकः (च) न्यायः (मे) (त्वष्टा) विच्छेदकोऽग्निः (च) पुरुषार्थः (मे) (इन्द्रः) शत्रुविदारको राजा (च) शिल्पम् (मे) (मरुतः) ब्रह्माण्डस्था अन्ये वायवः (च) शारीरा धातवः (मे) (इन्द्रः) सर्वाभिव्यापिका तडित् (च) एतत्प्रयोगः (मे) (विश्वे) सर्वे (च) सर्वस्वम् (मे) (देवाः) दिव्यगुणाः पृथिव्यादयः (इन्द्रः) परमैश्वर्यप्रदाता (च) एतदुपयोगः (मे) (यज्ञेन) वायुविद्याविधानेन (कल्पन्ताम्) ॥१७ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - मे मित्रश्च म इन्द्रश्च मे वरुणश्च म इन्द्रश्च मे धाता च म इन्द्रश्च मे त्वष्टा च म इन्द्रश्च मे मरुतश्च म इन्द्रश्च मे विश्वे च देवा म इन्द्रश्च यज्ञेन कल्पन्ताम् ॥१७ ॥
भावार्थभाषाः - मनुष्याः प्राणविद्युद्विद्यां विज्ञायैतयोः सर्वत्राभिव्याप्तिं च ज्ञात्वा दीर्घजीवनं सम्पादयेयुः ॥१७ ॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - माणसांनी प्राण व विद्युत विद्या यांची सर्वत्र व्याप्ती जाणावी व दीर्घजीवी बनावे.