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वि॒श्वक॑र्मा॒ ह्यज॑निष्ट दे॒वऽआदिद् ग॑न्ध॒र्वोऽअ॑भवद् द्वि॒तीयः॑। तृ॒तीयः॑ पि॒ता ज॑नि॒तौष॑धीनाम॒पां गर्भं॒ व्य᳖दधात् पुरु॒त्रा ॥३२ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

वि॒श्वऽक॑र्मा। हि। अज॑निष्ट। दे॒वः। आत्। इत्। ग॒न्ध॒र्वः। अ॒भ॒व॒त्। द्वि॒तीयः॑। तृ॒तीयः॑। पि॒ताः। ज॒नि॒ता। ओष॑धीनाम्। अ॒पाम्। गर्भ॑म्। वि। अ॒द॒धा॒त्। पु॒रु॒त्रेति॑ पुरु॒ऽत्रा ॥३२ ॥

यजुर्वेद » अध्याय:17» मन्त्र:32


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो ! इस जगत् में (विश्वकर्मा) जिस के समस्त शुभ काम हैं, वह (देवः) दिव्यस्वरूप वायु प्रथम (इत्) ही (अभवत्) होता है, (आत्) इसके अन्तर (गन्धर्वः) जो पृथिवी को धारण करता है, वह सूर्य वा सूत्रात्मा वायु (अजनिष्ट) उत्पन्न और (ओषधीनाम्) यव आदि ओषधियों (अपाम्) जलों और प्राणों का (पिता) पालन करनेहारा (हि) ही (द्वितीयः) दूसरा अर्थात् धनञ्जय तथा जो प्राणों के (गर्भम्) गर्भ अर्थात् धारण को (व्यदधात्) विधान करता है, वह (पुरुत्रा) बहुतों का रक्षक (जनिता) जलों का धारण करनेहारा मेघ (तृतीयः) तीसरा उत्पन्न होता है, इस विषय को आप लोग जानो ॥३२ ॥
भावार्थभाषाः - सब मनुष्यों को योग्य है कि इस संसार में सब कामों के सेवन करनेहारे जीव पहिले, बिजुली, अग्नि, वायु और सूर्य पृथिवी आदि लोकों के धारण करनेहारे हैं, वे दूसरे और मेघ आदि तीसरे हैं, उनमें पहिले जीव अज अर्थात् उत्पन्न नहीं होते और दूसरे, तीसरे उत्पन्न हुए हैं, परन्तु वे भी कारणरूप से नित्य हैं, ऐसा जानें ॥३२ ॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

अन्वय:

(विश्वकर्मा) विश्वानि सर्वाणि शुभानि कर्माणि यस्य सः (हि) खलु (अजनिष्ट) जनितवान् (देवः) दिव्यस्वरूपः (आत्) (इत्) (गन्धर्वः) गां पृथिवीं धरति स सूर्यः सूत्रात्मा वायुर्वा (अभवत्) भवति (द्वितीयः) द्वयोः संख्यापूरको धनञ्जयः (तृतीयः) त्रयाणां संख्यापूरकः प्राणादिस्वरूपः (पिता) पालकः (जनिता) प्रसिद्धिकर्त्ताऽपां धर्त्ता पर्जन्यः (ओषधीनाम्) यवादीनाम् (अपाम्) जलानां प्राणानां वा (गर्भम्) धारणम् (वि) (अदधात्) दधाति (पुरुत्रा) यः पुरून् बहून् त्रायते सः ॥३२ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्याः ! अत्र जगति विश्वकर्मा देवो वायुरादिम इदभवदादनन्तरं गन्धर्वोऽजनिष्टौषधीनामपां पिता हि द्वितीयो यो गर्भं व्यदधात्, स पुरुत्रा जनिता पर्जन्यः तृतीयोऽभवदिति भवन्तो विदन्तु ॥३२ ॥
भावार्थभाषाः - सर्वैमनुष्यैरिह सकलकर्मसेवका जीवाः प्रथमा विद्युदग्निसूर्यवायवः पृथिव्यादिधारका द्वितीयास्तृतीयाः पर्जन्यादयस्तेषां जीवा अजा अन्ये सर्वे जातास्तेऽपि कारणरूपेण नित्याश्चेति वेद्यम् ॥३२ ॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या जगात सर्वात प्रथम कर्म करणारे जीव, द्वितीय सूर्य, वायू, विद्युत व अग्नी होत व तृतीय मेघ इत्यादी होत. त्यापैकी जीव उत्पन्न होत नाहीत. दुसरे, तिसरे उत्पन्न झालेले आहेत, तेही कारणरूपाने नित्य आहेत हे माणसांनी जाणावे.