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स॒जूर्ऋ॒तुभिः॑ स॒जूर्वि॒धाभिः॑ स॒जूर्दे॒वैः स॒जूर्दे॒वैर्व॑योना॒धैर॒ग्नये॑ त्वा वैश्वान॒राया॒श्विना॑ध्व॒र्यू सा॑दयतामि॒ह त्वा॑ स॒जूर्ऋ॒तुभिः॑ स॒जूर्वि॒धाभिः॑ स॒जूर्वसु॑भिः स॒जूर्दे॒वैर्व॑योना॒धैर॒ग्नये॑ त्वा वैश्वान॒राया॒श्विना॑ऽध्व॒र्यू सा॑दयतामि॒ह त्वा॑ स॒जूर्ऋ॒तुभिः॑ स॒जूर्वि॒धाभिः॑ स॒जू रु॒द्रैः स॒जूर्दे॒वैर्व॑योना॒धैर॒ग्नये॑ त्वा वैश्वान॒राया॒श्विना॑ध्व॒र्यू सा॑दयतामि॒ह त्वा॑ स॒जूर्ऋ॒तुभिः॑ स॒जूर्वि॒धाभिः॑ स॒जूरा॑दि॒त्यैः स॒जूर्दे॒वैर्व॑योना॒धैर॒ग्नये॑ त्वा वैश्वान॒राया॒श्विना॑ध्व॒र्यू सा॑दयतामि॒ह त्वा॑ स॒जूर्ऋ॒तुभिः॑ स॒जूर्वि॒धाभिः॑ स॒जूर्वि॒श्वै॑र्दे॒वैः स॒जूर्दे॒वैर्व॑योना॒धैर॒ग्नये॑ त्वा वैश्वान॒राया॒श्विना॑ध्व॒र्यू सा॑दयतामि॒ह त्वा॑ ॥७ ॥

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पद पाठ

स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। ऋ॒तुभि॒रित्यृ॒तुऽभिः॑। स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। वि॒धाभि॒रिति॑ वि॒ऽधाभिः॑। स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। दे॒वैः। स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। दे॒वैः। व॒यो॒ना॒धैरिति॑ वयःऽना॒धैः। अ॒ग्नये॑। त्वा॒। वै॒श्वा॒न॒राय॑। अ॒श्विना॑। अ॒ध्व॒र्यूऽइत्य॑ध्व॒र्यू। सा॒द॒य॒ता॒म्। इ॒ह। त्वा॒। स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। ऋ॒तुभि॒रित्यृ॒तुऽभिः॑। स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। वि॒धाभि॒रिति॑ वि॒ऽधाभिः॑। स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। वसु॑भि॒रिति॒ वसु॑ऽभिः। स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। दे॒वैः। व॒यो॒ना॒धैरिति॑ वयःऽना॒धैः। अ॒ग्नये॑। त्वा॒। वै॒श्वा॒न॒राय॑। अ॒श्विना॑। अ॒ध्व॒र्यूऽइत्य॑ध्व॒र्यू सा॒द॒य॒ता॒म्। इ॒ह। त्वा॒। स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। ऋ॒तुभि॒रित्यृ॒तुऽभिः॑। स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। वि॒धाभि॒रिति॑ वि॒ऽधाभिः॑। स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। रु॒द्रैः। स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। दे॒वैः। व॒यो॒ना॒धैरिति॑ वयःऽना॒धैः। अ॒ग्नये॑। त्वा॒। वै॒श्वा॒न॒राय॑। अ॒श्विना॑। अ॒ध्व॒र्यूऽइत्य॑ध्व॒र्यू। सा॒द॒य॒ता॒म्। इ॒ह। त्वा॒। स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। ऋ॒तुभि॒रित्यृ॒तुऽभिः॑। स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। वि॒धाभि॒रिति॑ वि॒ऽधाभिः॑। स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। आ॒दि॒त्यैः। स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। दे॒वैः। व॒यो॒ना॒धैरिति॑ वयःऽना॒धैः। अ॒ग्नये॑। त्वा॒। वै॒श्वा॒न॒राय॑। अ॒श्विना॑। अ॒ध्व॒र्यूऽइत्य॑ध्व॒र्यू। सा॒द॒य॒ता॒म्। इ॒ह। त्वा॒। स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। ऋ॒तुभि॒रित्यृ॒तुऽभिः॑। स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। वि॒धाभि॒रिति॑ वि॒ऽधाभिः॑। स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। विश्वैः॑। दे॒वैः। स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। दे॒वैः। व॒यो॒ना॒धैरिति॑ वयःऽना॒धैः। अ॒ग्नये॑। त्वा॒। वै॒श्वा॒न॒राय॑। अ॒श्विना॑। अ॒ध्व॒र्यूऽइत्य॑ध्व॒र्यू। सा॒द॒य॒ता॒म्। इ॒ह। त्वा॒ ॥७ ॥

यजुर्वेद » अध्याय:14» मन्त्र:7


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वही विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे स्त्रि वा पुरुष ! जिस (त्वा) तुझ को (इह) इस जगत् में (अध्वर्यू) रक्षा करने हारे (अश्विना) सब विद्याओं में व्यापक पढ़ाने और उपदेश करनेवाले पुरुष और स्त्री (वैश्वानराय) सम्पूर्ण पदार्थों की प्राप्ति के निमित्त (अग्नये) अग्नि विद्या के लिये (सादयताम्) नियुक्त करें और हम लोग भी जिस (त्वा) तुझ को स्थापित करें सो तू (ऋतुभिः) वसन्त और वर्षा आदि ऋतुओं के साथ (सजूः) एक सी तृप्ति वा सेवा से युक्त (विधाभिः) जलों के साथ (सजूः) प्रीतियुक्त (देवैः) अच्छे गुणों के साथ (सजूः) प्रीतिवाली वा प्रीतिवाला और (वयोनाधैः) जीवन आदि वा गायत्री आदि छन्दों के साथ सम्बन्ध के हेतु (देवैः) दिव्य सुख देने हारे प्राणों के साथ (सजूः) समान सेवन से युक्त हो। हे पुरुषार्थयुक्त स्त्रि वा पुरुष ! जिस (त्वा) तुझ को (इह) इस गृहाश्रम में (वैश्वानराय) सब जगत् के नायक (अग्नये) विज्ञानदाता ईश्वर की प्राप्ति के लिये (अध्वर्यू) रक्षक (अश्विना) सब विद्याओं में व्याप्त अध्यापक और उपदेशक (सादयताम्) स्थापित करें और जिस (त्वा) तुझको हम लोग नियत करें सो तू (ऋतुभिः) ऋतुओं के साथ (सजूः) पुरुषार्थी (विधाभिः) विविध प्रकार के पदार्थों के धारण के हेतु प्राणों की चेष्टाओं के साथ (सजूः) समान सेवनवाले (वसुभिः) अग्नि आदि आठ पदार्थों के साथ (सजूः) प्रीतियुक्त और (वयोनाधैः) विज्ञान का सम्बन्ध कराने हारे (देवैः) सुन्दर विद्वानों के साथ (सजूः) समान प्रीतिवाले हों। हे विद्या पढ़ने के लिये प्रवृत्त हुए ब्रह्मचारिणी वा ब्रह्मचारी ! जिस (त्वा) तुझ को (इह) इस ब्रह्मचर्य्याश्रम में (वैश्वानराय) सब मनुष्यों के सुख के साधन (अग्नये) शास्त्रों के विज्ञान के लिये (अध्वर्यू) पालने हारे (अश्विना) पूर्ण विद्यायुक्त अध्यापक और उपदेशक लोग (सादयताम्) नियुक्त करें और जिस (त्वा) तुझ को हम लोग स्थापित करें सो तू (ऋतुभिः) ऋतुओं के साथ (सजूः) अनुकूल सेवनवाले (विधाभिः) विविध प्रकार के पदार्थों के धारण के निमित्त प्राण की चेष्टाओं से (सजूः) समान प्रीतिवाले (रुद्रैः) प्राण, अपान, व्यान उदान, समान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त, धनञ्जय और जीवात्मा इन ग्यारहों के (सजूः) अनुसार सेवा करने हारे और (वयोनाधैः) वेदादि शास्त्रों के जनाने का प्रबन्ध करनेहारे (देवैः) विद्वानों के साथ (सजूः) बराबर प्रीतिवाले हों। हे पूर्णविद्यावाले स्त्री वा पुरुष ! जिस (त्वा) तुझ को (इह) इस संसार में (वैश्वानराय) सब मनुष्यों के लिये पूर्ण सुख के साथ (अग्नये) पूर्ण विज्ञान के लिये (अध्वर्यू) रक्षक (अश्विना) शीघ्र ज्ञानदाता लोग (सादयताम्) नियत करें और जिस (त्वा) तुझ को हम नियुक्त करें सो तू (ऋतुभिः) ऋतुओं के साथ (सजूः) अनुकूल आचरणवाले (विधाभिः) विविध प्रकार की सत्यक्रियाओं के साथ (सजूः) समान प्रीतिवाले (आदित्यैः) वर्ष के बारह महीनों के साथ (सजूः) अनुकूल आहारविहारयुक्त और (वयोनाधैः) पूर्ण विद्या के विज्ञान और प्रचार के प्रबन्ध करने हारे (देवैः) पूर्ण विद्यायुक्त विद्वानों के (सजूः) अनुकूल प्रीतिवाले हों। हे सत्य अर्थों का उपदेश करने हारी स्त्री वा पुरुष ! जिस (त्वा) तुझ को (इह) इस जगत् में (वैश्वानराय) सब मनुष्यों के हितकारी (अग्नये) अच्छे शिक्षा के प्रकाश के लिये (अध्वर्यू) ब्रह्मविद्या के रक्षक (अश्विना) शीघ्र पढ़ाने और उपदेश करनेहारे लोग (सादयताम्) स्थित करें और जिस (त्वा) तुझ को हम लोग नियत करें सो तू (ऋतुभिः) काल क्षण आदि सब अवयवों के साथ (सजूः) अनुकूल सेवी (विधाभिः) सुखों में व्यापक सब क्रियाओं के (सजूः) अनुसार होकर (विश्वैः) सब (देवैः) सत्योपदेशक पतियों के साथ (सजूः) समान प्रीतिवाले और (वयोनाधैः) कामयमान जीवन का सम्बन्ध करानेहारे (देवैः) परोपकार के लिये सत्य असत्य के जनानेवाले जनों के साथ (सजूः) समान प्रीतिवाले हों ॥७ ॥
भावार्थभाषाः - इस संसार में मनुष्य का जन्म पाके स्त्री तथा पुरुष विद्वान् होकर जिन ब्रह्मचर्य्य-सेवन, विद्या और अच्छी शिक्षा के ग्रहण आदि शुभ-गुण, कर्मों में आप प्रवृत्त होकर जिन अन्य लोगों को प्रवृत्त करें, वे उन में प्रवृत्त होकर परमेश्वर से लेके पृथिवीपर्यन्त पदार्थों के यथार्थ विज्ञान से उपयोग ग्रहण करके सब ऋतुओं में आप सुखी रहें और अन्यों को सुखी करें ॥७ ॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

अन्वय:

(सजूः) यः समानं प्रीणाति सेवते वा (ऋतुभिः) वसन्तादिभिश्च सह (सजूः) (विधाभिः) अद्भिः (सजूः) (देवैः) दिव्यैर्गुणैः (सजूः) (देवैः) दिव्यसुखप्रदैः (वयोनाधैः) वयांसि जीवनादीनि गायत्र्यादिछन्दांसि वा नह्यन्ति यैः प्राणैस्तैः (अग्नये) पावकाय (त्वा) त्वाम् (वैश्वानराय) अखिलानां पदार्थानां नयनाय प्रापणाय (अश्विना) (अध्वर्यू) (सादयताम्) (इह) (त्वा) त्वां स्त्रियं पुरुषं वा (सजूः) (ऋतुभिः) (सजूः) (विधाभिः) (सजूः) (वसुभिः) अग्न्यादिभिरष्टभिः (सजूः) (देवैः) दिव्यैः (वयोनाधैः) वयांसि विज्ञानानि नह्यन्ति यैर्विद्वद्भिः (अग्नये) विज्ञानाय (त्वा) (वैश्वानराय) विश्वस्य सर्वस्य जगतो नायकाय (अश्विना) (अध्वर्यू) (सादयताम्) (इह) (त्वा) (सजूः) (ऋतुभिः) (सजूः) (विधाभिः) विविधानि वस्तूनि दधति याभिः प्राणचेष्टाभिस्ताभिः (सजूः) (रुद्रैः) प्राणापानव्यानोदानसमाननागकूर्मकृकलदेवदत्तधनञ्जयजीवैः (सजूः) (देवैः) विद्वद्भिः (वयोनाधैः) वेदादिशास्त्रप्रज्ञापनप्रबन्धकैः (अग्नये) शास्त्रविज्ञानाय (त्वा) (वैश्वानराय) विश्वेषां नराणामिदं सुखसाधकं तस्मै (अश्विना) (अध्वर्यू) (सादयताम्) (इह) (त्वा) (सजूः) (ऋतुभिः) सहचरितैः सुखैः (सजूः) (विधाभिः) विविधाभिः सत्यक्रियाधारिकाभिः क्रियाभिः (सजूः) (आदित्यैः) संवत्सरस्य द्वादशमासैः (सजूः) (देवैः) पूर्णविद्यैः (वयोनाधैः) पूर्णविद्याविज्ञानप्रचारप्रबन्धकैः (अग्नये) पूर्णाय विज्ञानाय (त्वा) (वैश्वानराय) विश्वेषां नराणामिदं पूर्णसुखसाधनं तस्मै (अश्विना) (अध्वर्यू) (सादयताम्) (इह) (त्वा) (सजूः) (ऋतुभिः) सर्वैः कालावयवैः (सजूः) (विधाभिः) समस्ताभिः सुखव्यापिकाभिः (सजूः) (विश्वैः) समस्तैः (देवैः) परोपकाराय सत्यासत्यविज्ञापयितृभिः (सजूः) (देवैः) (वयोनाधैः) ये वयः कामयमानं जीवनं नह्यन्ति तैः (अग्नये) सुशिक्षाप्रकाशाय (त्वा) (वैश्वानराय) विश्वेषां नराणामिदं हितं तस्मै (अश्विना) (अध्वर्यू) (सादयताम्) (इह) (त्वा)। [अयं मन्त्रः शत०८.२.२.८ व्याख्यातः] ॥७ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे स्त्रि पुरुष वा यं त्वा त्वामिहाध्वर्यू अश्विना वैश्वानरायाग्नये सादयतां वयं च यं त्वा सादयेम स त्वमृतुभिः सह सजूर्विधाभिः सह सजूर्देवैस्सह सजूर्वयोनाधैर्देवैः सह सजूश्च भव। हे पुरुषार्थयुक्ते स्त्रि वा पुरुष ! यं त्वा त्वामिह वैश्वानरायाग्नयेऽध्वर्यू अश्विना सादयतां यं त्वा वयं च सादयेम स त्वमृतुभिः सह सजूर्विधाभिः सह सजूर्वसुभिः सह सजूर्वयोनाधैर्देवैः सह च सजूर्भव। हे विद्याध्यायनाय प्रवृत्ते ब्रह्मचारिणि वा ब्रह्मचारिन् ! यं त्वेह वैश्वानरायाग्नयेऽध्वर्यू अश्विना सादयतां यं त्वा वयं च सादयेम स त्वमृतुभिः सह सजूर्विधाभिः सह सजूः रुद्रैः सह सजूर्वयोनाधैर्देवैः सह च सजूर्भव। हे पूर्णविद्ये स्त्रि पुरुष वा यं त्वेह वैश्वानरायाग्नयेऽध्वर्यू अश्विना सादयतां यं त्वा वयं च सादयेम स त्वमृतुभिः सह सजूर्विधाभिः सह सजूरादित्यैः सह सजूर्वयोनाधैर्देवैः सह च सजूर्भव। हे सत्यार्थोपदेशिके स्त्रि पुरुष वा यं त्वेह वैश्वानरायाग्नयेऽध्वर्यू अश्विना सादयतां यं त्वा वयं च सादयेम स त्वमृतुभिः सह सजूर्विधाभिः सह सजूर्विश्वैर्देवैः सह सजूर्वयोनाधैर्देवैः सह च सजूर्भव ॥७ ॥
भावार्थभाषाः - अस्मिन् जगति मनुष्यजन्म प्राप्य स्त्रियो विदुष्यः पुरुषा विद्वांसश्च भूत्वा येषु ब्रह्मचर्यविद्यासुशिक्षाग्रहणादिषु शुभेषु कर्मसु स्वयं प्रवृत्ता भूत्वा यानन्यान् प्रवर्त्तयेयुस्तेऽत्र प्रवर्त्तित्वा परमेश्वरमारभ्य पृथिवीपर्य्यन्तानां पदार्थानां यथार्थेन विज्ञानेनोपयोगं संगृह्य सर्वेष्वृतुषु स्वयं सुखयन्त्वन्यांश्च ॥७ ॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या जगात मनुष्यजन्म प्राप्त झाल्यामुळे स्त्री-पुरुषांनी विद्वान बनून ब्रह्मचर्य सेवन, विद्या व चांगले शिक्षण घेऊन शुभ गुणकर्मामध्ये स्वतः प्रवृत्त होऊन इतरांनाही प्रवृत्त करावे. त्यांनी परमेश्वरापासून पृथ्वीपर्यंत पदार्थांच्या विज्ञानाचा योग्य उपयोग करून घेऊन सर्व ऋतूंमध्ये स्वतः सुखी व्हावे व इतरांनाही सुखी करावे.