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याश्चे॒दमु॑पशृ॒ण्वन्ति॒ याश्च॑ दू॒रं परा॑गताः। सर्वाः॑ सं॒गत्य॑ वीरुधो॒ऽस्यै संद॑त्त वी॒र्य्य᳖म् ॥९४ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

याः। च॒। इ॒दम्। उ॒प॒शृ॒ण्वन्तीत्यु॑पऽशृ॒ण्वन्ति॑। याः। च॒। दू॒रम्। परा॑गता॒ इति॒ परा॑ऽगताः। सर्वाः॑। सं॒गत्येति॑ सम्ऽगत्य॑। वी॒रु॒धः॒। अ॒स्यै। सम्। द॒त्त॒। वी॒र्य्य᳖म् ॥९४ ॥

यजुर्वेद » अध्याय:12» मन्त्र:94


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

शुद्ध देशों से ओषधियों का ग्रहण करें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे विद्वानो ! आप लोग (याः) जो (च) विदित हुई और जिनको (उपशृण्वन्ति) सुनते हैं, (याः) जो (च) समीप हों, और जो (दूरम्) दूर देश में (परागताः) प्राप्त हो सकती हैं, उन (सर्वाः) सब (वीरुधः) वृक्ष आदि ओषधियों को (सङ्गत्य) निकट प्राप्त कर (इदम्) इस (वीर्य्यम्) शरीर के पराक्रम को वैद्य मनुष्य लोग जैसे सिद्ध करते हैं, वैसे उन ओषधियों का विज्ञान (अस्यै) इस कन्या को (संदत्त) सम्यक् प्रकार से दीजिये ॥९४ ॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्यो ! तुम लोग, जो ओषधियाँ दूर वा समीप में रोगों को हरने और बल करने हारी सुनी जाती हैं, उनको उपकार में ला के रोगरहित होओ ॥९४ ॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

शुद्धेभ्यो देशेभ्य ओषधयः संग्राह्या इत्याह ॥

अन्वय:

(याः) (च) विदिताः (इदम्) (उपशृण्वन्ति) (याः) (च) समीपस्थाः (दूरम्) (परागताः) (सर्वाः) (सङ्गत्य) एकीभूत्वा (वीरुधः) वृक्षप्रभृतयः (अस्यै) प्रजायै (सम्) (दत्त) (वीर्य्यम्) पराक्रमम् ॥९४ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे विद्वांसः ! भवन्तो याश्चोपशृण्वन्ति, याश्च दूरं परागतास्ताः सर्वा वीरुधः सङ्गत्येदं वीर्य्यं प्रसाध्नुवन्ति, तासां विज्ञानमस्यै कन्यायै संदत्त ॥९४ ॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्याः ! या ओषधयो दूरसमीपस्था रोगापहारिण्यो बलकारिण्यः श्रूयन्ते, ता उपयुज्यारोगिणो भवत ॥९४ ॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - हे माणसांनो ! जवळ असलेल्या किंवा दूर असलेल्या रोगनाशक व बलदायक अशा औषधांचे ज्ञान प्राप्त करून त्यांचा उपयोग करून निरोगी बना.