वांछित मन्त्र चुनें

इष्कृ॑ति॒र्नाम॑ वो मा॒ताथो॑ यू॒यꣳ स्थ॒ निष्कृ॑तीः। सी॒राः प॑त॒त्रिणी॑ स्थन॒ यदा॒मय॑ति॒ निष्कृ॑थ ॥८३ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इष्कृ॑तिः। नाम॑। वः॒। मा॒ता। अथो॒ऽइत्यथो॑। यू॒यम्। स्थ॒। निष्कृ॑तीः। निष्कृ॑ती॒रिति॒ निःऽकृ॑तीः। सी॒राः। प॒त॒त्रिणीः॑। स्थ॒न॒। यत्। आ॒मय॑ति। निः। कृ॒थ॒ ॥८३ ॥

यजुर्वेद » अध्याय:12» मन्त्र:83


120 बार पढ़ा गया

हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

अच्छे प्रकार सेवन की हुई ओषधी क्या करती हैं। यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो ! (यूयम्) तुम लोग जो (वः) तुम्हारी (इष्कृतिः) कार्य्यसिद्धि करने हारी (माता) माता के समान ओषधी (नाम) प्रसिद्ध है, उसकी सेवा के तुल्य सेवन की हुई ओषधियों को जाननेवाले (स्थ) होओ (पतत्रिणीः) चलनेवाली (सीराः) नदियों के समान (निष्कृतीः) प्रत्युपकारों को सिद्ध करनेवाले (स्थन) होओ। (अथो) इसके अनन्तर (यत्) जो क्रिया वा ओषधी अथवा वैद्य (आमयति) रोग बढ़ावे, उसको (निष्कृथ) छोड़ो ॥८३ ॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे माता-पिता तुम्हारी सेवा करते हैं, वैसे तुम भी उनकी सेवा करो। जो-जो काम रोगकारी हो, उस-उस को छोड़ो। इस प्रकार सेवन की हुई ओषधी माता के समान प्राणियों को पुष्ट करती है ॥८३ ॥
120 बार पढ़ा गया

संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

सुसेविता ओषधयः किं कुर्वन्तीत्याह ॥

अन्वय:

(इष्कृतिः) निष्कर्त्री (नाम) प्रसिद्धम् (वः) युष्माकम् (माता) जननीव (अथो) (यूयम्) (स्थ) भवत (निष्कृतीः) प्रत्युपकारान् (सीराः) नदीः। सीरा इति नदीनामसु पठितम् ॥ (निघं०१.१३) (पतत्रिणीः) पतितुं गन्तुं शीलाः (स्थन) भवत (यत्) या क्रिया (आमयति) रोगयति (निः) नितराम् (कृथ) कुरुत, अत्र विकरणस्य लुक् ॥८३ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्याः ! यूयं या व इष्कृतिर्मातेवौषधिर्नाम वर्त्तते, तस्याः सेवका इवौषधीः सेवितारः स्थ। पतत्रिणीः सीराः नद्य इव निष्कृतीः सम्पादयन्तः स्थनाथो यदाऽऽमयति तान्निष्कृथ ॥८३ ॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। हे मनुष्याः ! यथा मातापितरौ युष्मान् सेवन्ते, तथा यूयमप्येतान् सेवध्वम्। यद्यत्कर्म रोगाविष्करं भवति तत्तत् त्यजत। एवं सुसेविता ओषधयः प्राणिनो मातृवत् पोषयन्ति ॥८३ ॥
120 बार पढ़ा गया

मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. हे माणसांनो ! माता - पिता जशी तुमची सेवा करतात तशी तुम्हीही त्यांची सेवा करा. जे जे काम रोग निर्माण करणारे असेल त्याचा त्याग करा. याप्रमाणे औषधांचे (सोमलता वगैरे) सेवन करण्याने मातेप्रमाणे ती प्राण्यांना पुष्ट करते.