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अग्ने॑ऽअङ्गिरः श॒तं ते॑ सन्त्वा॒वृतः॑ सह॒स्रं॑ तऽउपा॒वृतः॑। अधा॒ पोष॑स्य॒ पोषे॑ण॒ पुन॑र्नो न॒ष्टमाकृ॑धि॒ पुन॑र्नो र॒यिमाकृ॑धि ॥८ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अग्ने॑। अ॒ङ्गि॒रः॒। श॒तम्। ते॒। स॒न्तु॒। आ॒वृत॒ इत्या॒ऽवृ॑तः। स॒हस्र॑म्। ते॒। उ॒पा॒वृत॒ इत्यु॑पऽआ॒वृतः॑। अध॑। पोष॑स्य। पोषे॑ण। पुनः॑। नः॒। न॒ष्टम्। आ। कृ॒धि॒। पुनः॑। नः॒। र॒यिम्। आ। कृ॒धि॒ ॥८ ॥

यजुर्वेद » अध्याय:12» मन्त्र:8


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर विद्याभ्यास करना चाहिये, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (अग्ने) पदार्थविद्या के जाननेहारे (अङ्गिरः) विद्या के रसिक विद्वन् पुरुष ! जिस पुरुषार्थी (ते) आपकी अग्नि के समान (शतम्) सैकड़ों (आवृतः) आवृत्तिरूप क्रिया और (सहस्रम्) हजारह (ते) आपके (उपावृतः) आवृत्तिरूप सुखों के भोग (सन्तु) होवें, (अध) इसके पश्चात् आप इनसे (पोषस्य) पोषक मनुष्य की (पोषेण) रक्षा से (नष्टम्) परोक्ष भी विज्ञान को (नः) हमारे लिये (पुनः) फिर भी (आकृधि) अच्छे प्रकार कीजिये तथा बिगड़ी हुई (रयिम्) प्रशंसित शोभा को (पुनः) फिर भी (नः) हमारे अर्थ (आकृधि) अच्छे प्रकार कीजिये ॥८ ॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को योग्य है कि विद्याओं में सैकड़ों आवृत्ति और शिल्प विद्याओं में हजारह प्रकार की प्रवृत्ति और प्रसिद्ध अप्रसिद्ध विद्याओं का प्रकाश करके सब प्राणियों के लिये लक्ष्मी और सुख उत्पन्न करें ॥८ ॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनर्विद्याभ्यासमाह ॥

अन्वय:

(अग्ने) पदार्थविद्यावित् (अङ्गिरः) विद्यारसयुक्त (शतम्) (ते) तव (सन्तु) (आवृतः) आवृत्तिरूपाः क्रियाः (सहस्रम्) (ते) (उपावृतः) ये भोगा उपावर्त्तन्ते (अध) अथ निपातस्य च [अष्टा०६.३.१३६] इति दीर्घः (पोषस्य) पोषकस्य जनस्य (पोषेण) पालनेन (पुनः) (नः) अस्मभ्यम् (नष्टम्) अदृष्टं विज्ञानम् (आ) समन्तात् (कृधि) कुरु (पुनः) (नः) अस्मभ्यम् (रयिम्) प्रशस्तां श्रियम् (आ) (कृधि) कुरु। [अयं मन्त्रः शत०६.७.३.६ व्याख्यातः] ॥८ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे अग्नेऽङ्गिरो विद्वन् ! यस्य पुरुषार्थिनस्ते तवाऽग्नेरिव शतमावृतः सहस्रं ते तवोपावृतः सन्तु, अध त्वमेतैः पोषस्य पोषेण नष्टमपि नः पुनराकृधि नो रयिं पुनराकृधि ॥८ ॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यैर्विद्यासु शतश आवृत्तीः कृत्वा शिल्पविद्यासु सहस्रमुपावृत्तीश्च गुप्तागुप्ता विद्याः प्रकाश्य सर्वेषां श्रीसुखं जननीयम् ॥८ ॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - माणसांनी विद्या प्राप्त करताना अनेक वेळा आवृत्ती करावी व शिल्पविद्या शिकताना विविध प्रकारे तत्परता दाखवून विद्या प्रकट करून सर्वांसाठी ऐश्वर्य व सुख प्राप्त करावे.