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कामं॑ कामदुघे धुक्ष्व मि॒त्राय॒ वरु॑णाय च। इन्द्रा॑या॒श्विभ्यां॑ पू॒ष्णे प्र॒जाभ्य॒ऽओष॑धीभ्यः ॥७२ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

काम॑म्। का॒म॒दु॒घ॒ इति॑ कामऽदुघे। धु॒क्ष्व॒। मि॒त्राय॑। वरु॑णाय। च॒। इन्द्रा॑य। अ॒श्विभ्या॒मित्य॒श्विऽभ्या॑म्। पू॒ष्णे। प्र॒जाभ्य॒ इति॑ प्र॒जाऽभ्यः॑। ओष॑धीभ्यः ॥७२ ॥

यजुर्वेद » अध्याय:12» मन्त्र:72


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

पकानेहारी स्त्री अच्छे यत्न से सुन्दर अन्न और व्यञ्जनों को बनावे, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (कामदुघे) इच्छा को पूर्ण करने हारी रसोइया स्त्री ! तू पृथिवी के समान सुन्दर संस्कार किये अन्नों से (मित्राय) मित्र (वरुणाय) उत्तम विद्वान् (च) अतिथि अभ्यागत (इन्द्राय) परम ऐश्वर्य्य से युक्त (अश्विभ्याम्) प्राण-अपान (पूष्णे) पुष्टिकारक जन (प्रजाभ्यः) सन्तानों और (ओषधीभ्यः) सोमलता आदि ओषधियों से (कामम्) इच्छा को (धुक्ष्व) पूर्ण कर ॥७२ ॥
भावार्थभाषाः - जो स्त्री वा पुरुष भोजन बनावे, उसको चाहिये कि पकाने की विद्या सीख, प्रिय पदार्थ पका और उनका भोजन करा के सब को रोगरहित रक्खें ॥७२ ॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

पाचिका स्त्री प्रयत्नेन सुसंस्कृतान्यन्नानि व्यञ्जनानि कुर्यादित्याह ॥

अन्वय:

(कामम्) इच्छाम् (कामदुघे) इच्छापूरिके (धुक्ष्व) पिपूर्धि (मित्राय) सुहृदे (वरुणाय) उत्तमाय विदुषे (च) अतिथये (इन्द्राय) परमैश्वर्य्ययुक्ताय (अश्विभ्याम्) प्राणापानाभ्याम् (पूष्णे) पुष्टिकराय (प्रजाभ्यः) स्वसन्तानेभ्यः (ओषधीभ्यः) सोमयवादिभ्यः। [अयं मन्त्रः शत०७.२.२.१२ व्याख्यातः] ॥७२ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे कामदुघे पाचिके त्वं भूमिरिव सुसंस्कृतैरन्नैर्मित्राय वरुणाय चेन्द्रायाश्विभ्यां पूष्णे प्रजाभ्य ओषधीभ्यः कामं धुक्ष्व ॥७२ ॥
भावार्थभाषाः - या स्त्री वा पुरुषः पाकं कुर्य्यात् तां तं च पाकविद्यां सुशिक्ष्य हृद्यान्यन्नानि निर्माय संभोज्य सर्वान् रोगान् दूरीकुर्यात् ॥७२ ॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जे स्त्री - पुरुष अन्न तयार करतात त्यांनी पाककलेची विद्या जाणावी व चांगले पदार्थ तयार करून सर्वांना भोजन द्यावे व निरोगी करावे.