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लाङ्ग॑लं॒ पवी॑रवत् सु॒शेव॑ꣳ सोम॒पित्स॑रु। तदुद्व॑पति॒ गामविं॑ प्रफ॒र्व्यं᳖ च॒ पीव॑रीं प्र॒स्थाव॑द् रथ॒वाह॑णम् ॥७१ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

लाङ्ग॑लम्। पवी॑रवत्। सु॒शेव॒मिति॑ऽसु॒ऽशेव॑म्। सो॒म॒पित्स॒र्विति॑ सोम॒पिऽत्स॑रु। तत्। उत्। व॒प॒ति॒। गाम्। अवि॑म्। प्र॒फ॒र्व्य᳖मिति॑ प्रऽफ॒र्व्य᳖म्। च॒। पीव॑रीम्। प्र॒स्थाव॒दिति॑ प्र॒स्थाऽव॑त्। र॒थ॒वाह॑नम्। र॒थ॒वाह॑न॒मिति॑ रथ॒ऽवाह॑नम् ॥७१ ॥

यजुर्वेद » अध्याय:12» मन्त्र:71


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर भी उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे किसानो ! तुम लोग जो (सोमपित्सरु) जौ आदि ओषधियों के रक्षकों को टेढ़ा चलावे (पवीरवत्) प्रशंसित फाल से युक्त (सुशेवम्) सुन्दर सुखदायक (लाङ्गलम्) फाले के पीछे जो दृढ़ता के लिये काष्ठ लगाया जाता है, वह (च) और (प्रफर्व्यम्) चलाने योग्य (प्रस्थावत्) प्रशंसित प्रस्थानवाला (रथवाहनम्) रथ के चलने का साधन है, जिससे (अविम्) रक्षा आदि के हेतु (पीवरीम्) सब पदार्थों को भुगाने का हेतु स्थूल (गाम्) पृथिवी को (उद्वपति) उखाड़ते हैं (तत्) उसको तुम भी सिद्ध करो ॥७१ ॥
भावार्थभाषाः - किसान लोगों को उचित है कि मोटी मट्टी अन्न आदि की उत्पत्ति से रक्षा करने हारी पृथिवी की अच्छे प्रकार परीक्षा करके हल आदि साधनों से जोत, एकसार कर, सुन्दर संस्कार किये बीज [बो] के उत्तम धान्य उत्पन्न करके भोगें ॥७१ ॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

अन्वय:

(लाङ्गलम्) सीरापश्चाद् भागे दार्ढ्याय संयोज्यं काष्ठम् (पवीरवत्) प्रशस्तः पवीरः फालो विद्यते यस्मिन् तत् (सुशेवम्) सुष्ठु सुखकरम् (सोमपित्सरु) ये सोमयवाद्योषधीः पालयन्ति तान् त्सरयति कुटिलं गमयति (तत्) (उत्) (वपति) (गाम्) पृथिवीम् (अविम्) रक्षणादिहेतुम् (प्रफर्व्यम्) प्रफर्वितुं गमयितुं योग्यम् (च) (पीवरीम्) यया पाययन्ति तां स्थूलाम् (प्रस्थावत्) प्रशस्तं प्रस्थानं यस्यास्ति तत् (रथवाहनम्) रथं वहति येन तत्। [अयं मन्त्रः शत०७.२.२.११ व्याख्यातः] ॥७१ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे कृषीवलाः ! यूयं सोमपित्सरु पवीरवत् सुशेवं लाङ्गलं प्रफर्व्यं प्रस्थावद् रथवाहनं चास्ति, येनाविं पीवरीं गामुद्वपति तद्यूयं साध्नुत ॥७१ ॥
भावार्थभाषाः - कृषीवलैः स्थूलमृत्स्नामन्नाद्युत्पादनेन रक्षिकां सुपरीक्ष्य हलादिसाधनैः संकृष्य समीकृत्य सुसंस्कृतानि बीजानि समुप्योत्तमानि धान्यान्युत्पाद्य भोक्तव्यानि ॥७१ ॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - शेतकऱ्यांनी अन्न इत्यादी उत्पन्न करण्यासाठी व भूमीचे रक्षण व्हावे यासाठी जमिनीची चांगली परीक्षा करावी. नांगर इत्यादींनी जमीन नांगरून समतल करावी. संस्कारित बीज पेरून उत्तम धान्य उत्पन्न करावे व त्यांचा उपभोग घ्यावा.