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समि॑त॒ꣳ संक॑ल्पेथा॒ संप्रि॑यौ रोचि॒ष्णू सु॑मन॒स्यमा॑नौ। इष॒मूर्ज॑म॒भि सं॒वसा॑नौ ॥५७ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सम्। इ॒त॒म्। सम्। क॒ल्पे॒था॒म्। संप्रि॑या॒विति॒ सम्ऽप्रि॑यौ। रो॒चि॒ष्णूऽइति॑ रोचि॒ष्णू। सु॒म॒न॒स्यमा॑नाविति॑ सुऽमन॒स्यमा॑नौ। इष॑म्। ऊर्ज॑म्। अ॒भि। सं॒वसा॑ना॒विति॑ स॒म्ऽवसा॑नौ ॥५७ ॥

यजुर्वेद » अध्याय:12» मन्त्र:57


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

पश्चात् विवाह करके कैसे वर्त्तें, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे विवाहित स्त्रीपुरुषो ! तुम (संप्रियौ) आपस में सम्यक् प्रीतिवाले (रोचिष्णू) विषयासक्ति से पृथक् प्रकाशमान (सुमनस्यमानौ) मित्र विद्वान् पुरुषों के समान वर्त्तमान (संवसानौ) सुन्दर वस्त्र और आभूषणों से युक्त हुए (इषम्) इच्छा से (समितम्) इकट्ठे प्राप्त होओ और (ऊर्जम्) पराक्रम को (अभि) सन्मुख (संकल्पेथाम्) एक अभिप्राय में समर्पित करो ॥५७ ॥
भावार्थभाषाः - जो स्त्रीपुरुष सर्वथा विरोध को छोड़ के एक-दूसरे की प्रीति में तत्पर, विद्या के विचार से युक्त तथा अच्छे-अच्छे वस्त्र और आभूषण धारण करनेवाला होके प्रयत्न करें, तो घर में कल्याण और आरोग्य बढ़े, और जो परस्पर विरोधी हों, तो दुःखसागर में अवश्य डूबें ॥५७ ॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथ विवाहं कृत्वा कथं वर्त्तिव्यमित्याह ॥

अन्वय:

(सम्) एकीभावम् (इतम्) प्राप्नुतम् (सम्) समानाभिप्राये (कल्पेथाम्) समर्थयताम् (संप्रियौ) परस्परं सम्यक् प्रीतियुक्तौ (रोचिष्णू) विषयासक्तिविरहत्वेन देदीप्यमानौ (सुमनस्यमानौ) सुमनसौ सखायौ विद्वांसाविवाचरन्तौ (इषम्) इच्छाम् (ऊर्जम्) पराक्रमम् (अभि) आभिमुख्ये (संवसानौ) सम्यक् सुवस्त्रालंकारैराच्छादितौ। [अयं मन्त्रः शत०७.१.१.३८ व्याख्यातः] ॥५७ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे विवाहितौ स्त्रीपुरुष ! युवां संप्रियौ रोचिष्णू सुमनस्यमानौ संवसानौ सन्ताविषं समितमूर्जमभि संकल्पेथाम् ॥५७ ॥
भावार्थभाषाः - यदि स्त्रीपुरुषौ सर्वथा विरोधं विहायान्योन्यस्य प्रियाचरणे रतौ, विद्याविचारयुक्तौ सुवस्त्रालंकृतौ भूत्वा प्रयतेताम्, तदा गृहे कल्याणमारोग्यं वर्धेताम्। यदि च विद्वेषिणौ भवेताम्, तदा दुःखसागरे संमग्नौ भवेताम् ॥५७ ॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जे स्त्री-पुरुष सर्वस्वी विरोध सोडून एकमेकांवर प्रीती करतात व विद्यायुक्त बनतात, चांगली वस्त्रे व आभूषणांनी अलंकृत होऊन प्रेमाने राहतात तेव्हा त्यांच्या कुटुंबाचे कल्याण होते व आरोग्य वाढते. जर ते परस्परविरोधी असतील तर निश्चितपणे दुःखसागरात बुडतात.