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पु॒री॒ष्या᳖सोऽअ॒ग्नयः॑ प्राव॒णेभिः॑ स॒जोष॑सः। जु॒षन्तां॑ य॒ज्ञम॒द्रुहो॑ऽनमी॒वाऽइषो॑ म॒हीः ॥५० ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

पु॒री॒ष्या᳖सः। अ॒ग्नयः॑। प्रा॒व॒णेभिः॑। प्र॒व॒णेभि॒रिति॑ प्रऽव॒णेभिः॑। स॒जोष॑स॒ इति॑ स॒ऽजोष॑सः। जु॒षन्ता॑म्। य॒ज्ञम्। अ॒द्रुहः॑। अ॒न॒मी॒वाः। इषः॑। म॒हीः ॥५० ॥

यजुर्वेद » अध्याय:12» मन्त्र:50


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

मनुष्यों को द्वेषादिक छोड़ के आनन्द में रहना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - सब मनुष्यों को चाहिये कि (प्रावणेभिः) विज्ञानों के साथ वर्त्तमान हुए (अनमीवाः) रोगरहित (अद्रुहः) द्रोह से पृथक् (सजोषसः) एक प्रकार की सेवा और प्रीतिवाले (पुरीष्यासः) पूर्ण गुणक्रियाओं में निपुण (अग्नयः) अग्नि के समान वर्तमान तेजस्वी विद्वान् लोग (यज्ञम्) विद्याविज्ञान दान और ग्रहणरूप यज्ञ और (महीः) बड़ी-बड़ी (इषः) इच्छाओं को (जुषन्ताम्) सेवन करें ॥५० ॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे बिजुली अनुकूल हुई समान भाव से सब पदार्थों का सेवन करती है, वैसे ही रोगद्रोहादि दोषों से रहित आपस में प्रीतिवाले होके विद्वान् लोग विज्ञान बढ़ानेवाले यज्ञ को विस्तृत करके बड़े-बड़े सुखों को निरन्तर भोगें ॥५० ॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

मनुष्यैर्द्वेषादिकं विहायानन्दितव्यमित्युपदिश्यते ॥

अन्वय:

(पुरीष्यासः) पूर्णासु गुणक्रियासु भवाः (अग्नयः) वह्नय इव वर्त्तमाना विद्वांसः (प्रावणेभिः) विज्ञानैः, अत्र अन्येषामपि० [अष्टा०६.३.१३७] इति दीर्घत्वम् (सजोषसः) समानसेवाप्रीतयः (जुषन्ताम्) सेवन्ताम् (यज्ञम्) विद्याविज्ञानदानग्रहणाख्यम् (अद्रुहः) द्रोहरहिताः (अनमीवाः) अरोगाः (इषः) इच्छाः (महीः) महतीः। [अयं मन्त्रः शत०७.१.१.२५ व्याख्यातः] ॥५० ॥

पदार्थान्वयभाषाः - सर्वे मनुष्याः प्रावणेभिः सह वर्त्तमाना अनमीवा अद्रुहः सजोषसः पुरीष्यासोऽग्नय इव सन्तो यज्ञं महीरिषो जुषन्ताम् ॥५० ॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा विद्युदविरुद्धा सती समानसत्तया सर्वान् पदार्थान् सेवते, तथैव रोगद्रोहादिदोषै रहिताः परस्परं प्रीतिमन्तो भूत्वा विज्ञानवृद्धिकरं यज्ञं प्रतत्य महान्ति सुखानि सततं भुञ्जीरन् ॥५० ॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जशी विद्युत सर्व पदार्थांत समान असते तसे विद्वान लोकांनी रोग, द्रोह इत्यादी दोषांनी रहित होऊन आपापसात प्रेमाने राहून विज्ञानमय यज्ञ विस्तृत करावा आणि खूप सुख भोगावे.