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पुन॑रा॒सद्य॒ सद॑नम॒पश्च॑ पृथि॒वीम॑ग्ने। शेषे॑ मा॒तुर्यथो॒पस्थे॒ऽन्तर॑स्या शि॒वत॑मः ॥३९ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

पुनः॑। आ॒सद्येत्या॒ऽसद्य॑। सद॑नम्। अ॒पः। च॒। पृ॒थि॒वीम्। अ॒ग्ने॒। शेषे॑। मा॒तुः। यथा॑। उ॒पस्थ॒ इत्यु॒पऽस्थे॑। अ॒न्तः। अ॒स्या॒म्। शि॒वत॑म॒ इति॑ शि॒वऽत॑मः ॥३९ ॥

यजुर्वेद » अध्याय:12» मन्त्र:39


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब माता-पिता और पुत्र आपस में कैसे वर्त्तें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (अग्ने) ! इच्छा आदि गुणों से प्रकाशित जन ! जिस कारण तू (अपः) जलों (च) और (पृथिवीम्) भूमितल के (सदनम्) स्थान को (पुनः) फिर-फिर (आसद्य) प्राप्त होके (अस्याम्) इस माता के (अन्तः) गर्भाशय में (शिवतमः) मङ्गलकारी होके (यथा) जैसे (मातुः) माता की (उपस्थे) गोद में (शेषे) सोता है, वैसे ही माता की सेवा में मङ्गलकारी हो ॥३९ ॥
भावार्थभाषाः - पुत्रों को चाहिये कि जैसे माता अपने पुत्रों को सुख देती है, वैसे ही अनुकूल सेवा से अपनी माताओं को निरन्तर आनन्दित करें और माता-पिता के साथ विरोध कभी न करें और माता-पिता को भी चाहिये कि अपने पुत्रों को अधर्म और कुशिक्षा से युक्त कभी न करें ॥३९ ॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथ मातापित्रपत्यानि परस्परं कथं वर्त्तेरन्नित्याह ॥

अन्वय:

(पुनः) (आसद्य) आगत्य (सदनम्) गर्भस्थानम् (अपः) (च) भोजनादिकम् (पृथिवीम्) भूमितलम् (अग्ने) इच्छादिगुणप्रकाशित (शेषे) स्वपिषि (मातुः) जनन्याः (यथा) (उपस्थे) उत्सङ्गे (अन्तः) आभ्यन्तरे (अस्याम्) मातरि (शिवतमः) अतिशयेन मङ्गलकारी। [अयं मन्त्रः शत०६.८.२.६ व्याख्यातः] ॥३९ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे अग्ने ! यतस्त्वमपः पृथिवीं च सदनं पुनरासद्यास्यामन्तः शिवतमः सन् यथा बालो मातुरुपस्थे शेषे तस्मादस्यां शिवतमो भव ॥३९ ॥
भावार्थभाषाः - पुत्रैर्यथा मातरः स्वापत्यानि सुखयन्ति, तथैवानुकूलया सेवया स्वमातरः सततमानन्दयितव्याः। न कदाचिन्मातापितृभ्यां विरोधः समाचरणीयः, न च मातापितृभ्यामेतेऽधर्मकुशिक्षायुक्ताः कदाचित् कार्य्याः ॥३९ ॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - ज्याप्रमाणे माता आपल्या पुत्रांना सुख देते त्याप्रमाणेच पुत्रांनी त्यांच्या अनुकूल सेवा करून आपल्या मातांना सदैव आनंदित करावे. माता व पिता यांना कधी विरोध करू नये, तसेच माता आणि पिता यांनीही आपल्या पुत्रांना अधर्माचे वाईट शिक्षण कधीही देऊ नये.