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अ॒प्स्व᳖ग्ने॒ सधि॒ष्टव॒ सौष॑धी॒रनु॑ रुध्यसे। गर्भे॒ सञ्जा॑यसे॒ पुनः॑ ॥३६ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒प्स्वित्य॒प्ऽसु। अ॒ग्ने॒। सधिः॑। तव॑। सः। ओष॑धीः। अनु॑। रु॒ध्य॒से॒। गर्भे॑। सन्। जा॒य॒से॒। पुन॒रिति॒ पुनः॑ ॥२६ ॥

यजुर्वेद » अध्याय:12» मन्त्र:36


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब जीव किस-किस प्रकार पुनर्जन्म को प्राप्त होते हैं, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (अग्ने) अग्नि के तुल्य विद्वान् जीव ! जो तू (सधिः) सहनशील (अप्सु) जलों में (ओषधीः) सोमलता आदि ओषधियों को (अनुरुध्यसे) प्राप्त होता है, (सः) सो (गर्भे) गर्भ में (सन्) स्थित होकर (पुनः) फिर-फिर (जायसे) जन्म लेता है, ये ही दोनों प्रकार आने-जाने अर्थात् जन्म-मरण (तव) तेरे हैं, ऐसा जान ॥३६ ॥
भावार्थभाषाः - जो जीव शरीर को छोड़ते हैं, वे वायु और ओषधि आदि पदार्थों से भ्रमण करते-करते गर्भाशय को प्राप्त होके नियत समय पर शरीर धारण करके प्रकट होते हैं ॥३६ ॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथ जीवाः कथं कथं पुनर्जन्म प्राप्नुवन्तीत्याह ॥

अन्वय:

(अप्सु) जलेषु (अग्ने) अग्निवद्वर्त्तमान विद्वन् (सधिः) सोढा, अत्र वर्णव्यत्ययेन हस्य धः, इश्च प्रत्ययः (तव) (सः) सोऽचि लोपे चेत्पादपूरणम् [अष्टा०६.१.१३४] इति सन्धिः (ओषधीः) सोमादीन् (अनु) (रुध्यसे) (गर्भे) कुक्षौ (सन्) (जायसे) (पुनः)। [अयं मन्त्रः शत०६.८.२.४ व्याख्यातः] ॥३६ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे अग्ने अग्निरिव जीव ! सधिर्यस्त्वमप्सु गर्भे ओषधीरनुरुध्यसे, स त्वं गर्भे स्थितः सन् पुनर्जायसे। इमावेव क्रमानुक्रमौ तव स्त इति जानीहि ॥३६ ॥
भावार्थभाषाः - ये जीवाः शरीरं त्यजन्ति, ते वाय्वोषध्यादिषु च भ्रान्त्वा, गर्भं प्राप्य यथासमयं सशरीरा भूत्वा पुनर्जायन्ते ॥३६ ॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जे जीव शरीर सोडतात ते वायू व औषधी (वनस्पती) इत्यादी पदार्थांमध्ये भ्रमण करून गर्भाशयात येतात व योग्य वेळ येताच शरीर धारण करून प्रकट होतात.