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दी॒र्घायु॑स्तऽओषधे खनि॒ता यस्मै॑ च त्वा॒ खना॑म्य॒हम्। अथो॒ त्वं दी॒र्घायु॑र्भू॒त्वा श॒तव॑ल्शा॒ विरो॑हतात् ॥१०० ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

दी॒र्घायु॒रिति॑ दी॒र्घऽआ॑युः। ते॒। ओ॒ष॒धे॒। ख॒नि॒ता। यस्मै॑। च॒। त्वा॒। खना॑मि। अ॒हम्। अथो॒ऽइत्यथो॑। त्वम्। दी॒र्घायु॒रिति॑ दी॒र्घऽआ॑युः। भू॒त्वा। श॒तव॒ल्शेति॑ श॒तऽव॑ल्शा। वि। रो॒ह॒ता॒त् ॥१०० ॥

यजुर्वेद » अध्याय:12» मन्त्र:100


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

मनुष्य कैसे हो के दूसरों को कैसे करें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (ओषधे) ओषधि के तुल्य ओषधियों के गुण-दोष जाननेहारे पुरुष ! जिससे (ते) तेरी जिस ओषधि का (खनिता) सेवन करने हारा (अहम्) मैं (यस्मै) जिस प्रयोजन के लिये (च) और जिस पुरुष के लिये (खनामि) खोदूँ, उससे तू (दीर्घायुः) अधिक अवस्थावाला हो, (अथो) और (दीर्घायुः) बड़ी अवस्थावाला (भूत्वा) होकर (त्वम्) तू जो (शतवल्शा) बहुत अङ्कुरों से युक्त ओषधि है, (त्वा) उसको सेवन करके सुखी हो और (वि, रोहतात्) प्रसिद्ध हो ॥१०० ॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्यो ! तुम लोग ओषधियों के सेवन से अधिक अवस्थावाले होओ और धर्म का आचरण करने हारे सब मनुष्यों को ओषधियों के सेवन से दीर्घ अवस्थावाले करो ॥१०० ॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

मनुष्याः कथं भूत्वा स्वभिन्नान् कथं कुर्युरित्याह ॥

अन्वय:

(दीर्घायुः) चिरमायुः (ते) तस्याः (ओषधे) ओषधिवद्वर्त्तमान विद्वन् (खनिता) सेवकः (यस्मै) (च) (त्वा) ताम् (खनामि) (अहम्) (अथो) (त्वम्) (दीर्घायुः) (भूत्वा) (शतवल्शा) शतमसंख्याता वल्शा अङ्कुरा यस्याः सा (वि) (रोहतात्) ॥१०० ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे ओषधे ओषध इव मनुष्य ! यस्य ते तव यामोषधीं खनिताऽहं यस्मै च खनामि, तया त्वं दीर्घायुर्भव, दीर्घार्युर्भूत्वाथो त्वं या शतवल्शौषधी वर्त्तते, त्वा तां सेवित्वाऽथ सुखी भव, तथा विरोहतात् ॥१०० ॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्याः ! यूयमोषधिसेवनेन दीर्घायुषो भवत। धर्माचारिणश्च भूत्वा सर्वानोषधिसेवनेनेदृशान् कुरुत ॥१०० ॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - हे माणसांनो ! तुम्ही औषधांचे सेवन करून अधिक आयुष्य वाढवा व धर्माचे आचरण करून सर्व माणसांनाही औषधांचे सेवन करावयास लावून दीर्घायू करा.