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आकू॑तिम॒ग्निं प्र॒युज॒ꣳ स्वाहा॒ मनो॑ मे॒धाम॒ग्निं प्र॒युज॒ꣳ स्वाहा॑ चि॒त्तं विज्ञा॑तम॒ग्निं प्र॒युज॒ꣳ स्वाहा॑ वा॒चो विधृ॑तिम॒ग्निं प्र॒युज॒ꣳ स्वाहा॑ प्र॒जाप॑तये॒ मन॑वे॒ स्वाहा॒ऽग्नये॑ वैश्वान॒राय॒ स्वाहा॑ ॥६६ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आकू॑तिमित्याऽकू॑तिम्। अ॒ग्निम्। प्र॒युज॒मिति॑ प्र॒ऽयुज॑म्। स्वाहा॑। मनः॑। मे॒धाम्। अ॒ग्निम्। प्र॒युज॒मिति॑ प्र॒ऽयुज॑म्। स्वाहा॑। चि॒त्तम्। विज्ञा॑त॒मिति॒ विऽज्ञा॑तम्। अ॒ग्निम्। प्र॒युज॒मिति॑ प्र॒ऽयुज॑म्। स्वाहा॑। वा॒चः। विधृ॑ति॒मिति॒ विऽधृ॑तिम्। अ॒ग्निम्। प्र॒युज॒मिति॑ प्र॒ऽयुज॑म्। स्वाहा॑। प्र॒जाप॑तय॒ इति॑ प्र॒जाऽप॑तये। मन॑वे। स्वाहा॑। अ॒ग्नये। वै॒श्वा॒न॒राय॑। स्वाहा॑ ॥६६ ॥

यजुर्वेद » अध्याय:11» मन्त्र:66


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वे स्त्री-पुरुष क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे स्त्री-पुरुषो ! तुम लोग वेद के गायत्री आदि मन्त्रों से (स्वाहा) सत्यक्रिया से (आकूतिम्) उत्साह देनेवाली क्रिया के (प्रयुजम्) प्रेरणा करने हारे (अग्निम्) प्रसिद्ध अग्नि को (स्वाहा) सत्यवाणी से (मनः) इच्छा के साधन को (मेधाम्) बुद्धि और (प्रयुजम्) सम्बन्ध करने हारी (अग्निम्) बिजुली को (स्वाहा) सत्य व्यवहारों से (विज्ञातम्) जाने हुए विषय के (प्रयुजम्) व्यवहारों में प्रयोग किये (अग्निम्) अग्नि के समान प्रकाशित (चित्तम्) चित्त को (स्वाहा) योगक्रिया की रीति से (वाचः) वाणियों की (विधृतिम्) विविध प्रकार की धारणा को (प्रयुजम्) संप्रयोग किये हुए (अग्निम्) योगाभ्यास से उत्पन्न की हुई बिजुली को (प्रजापतये) प्रजा के स्वामी (मनवे) मननशील पुरुष के लिये (स्वाहा) सत्यवाणी को और (अग्नये) विज्ञानस्वरूप (वैश्वानराय) सब मनुष्यों के बीच प्रकाशमान जगदीश्वर के लिये (स्वाहा) धर्मयुक्त क्रिया को युक्त करा के निरन्तर (आछृन्दन्तु) अच्छे प्रकार शुद्ध करो ॥६६ ॥
भावार्थभाषाः - यहाँ पूर्व मन्त्र से (आछृन्दन्तु) इस पद की अनुवृत्ति आती है। मनुष्यों को चाहिये कि पुरुषार्थ से वेदादि शास्त्रों को पढ़ और उत्साह आदि को बढ़ा कर व्यवहार परमार्थ की क्रियाओं के सम्बन्ध से इस लोक और परलोक के सुखों को प्राप्त हों ॥६६ ॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्ते स्त्रीपुरुषाः किं कुर्य्युरित्याह ॥

अन्वय:

(आकूतिम्) उत्साहकारिकां क्रियाम् (अग्निम्) प्रसिद्धं पावकम् (प्रयुजम्) यः सर्वान् युनक्ति तम् (स्वाहा) सत्यया क्रियया (मनः) इच्छासाधनम् (मेधाम्) प्रज्ञाम् (अग्निम्) विद्युतम् (प्रयुजम्) (स्वाहा) सत्यया वाचा (चित्तम्) चेतति येन तत् (विज्ञातम्) (अग्निम्) अग्निमिव भास्वरम् (प्रयुजम्) व्यवहारेषु प्रयुक्तम् (स्वाहा) सत्येन व्यवहारेण (वाचः) वाण्याः (विधृतिम्) विविधं धारणम् (अग्निम्) योगाभ्यासजनितां विद्युतम् (प्रयुजम्) संप्रयुक्तम् (स्वाहा) क्रियायोगरीत्या (प्रजापतये) प्रजास्वामिने (मनवे) मननशीलाय (स्वाहा) सत्यां वाणीम् (अग्नये) विज्ञानस्वरूपाय (वैश्वानराय) विश्वेषु नरेषु राजमानाय जगदीश्वराय (स्वाहा) धर्म्या क्रियाम्। [अयं मन्त्रः शत०६.६.१.१५-२० व्याख्यातः] ॥६६ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे स्त्रीपुरुषाः ! भवन्तो वेदस्थैर्गायत्र्यादिभिश्छन्दोभिः स्वाहा आकूतिं प्रयुजमग्निं स्वाहा मनो मेधां प्रयुजमग्निं स्वाहा चित्तं विज्ञातं प्रयुजमग्निं स्वाहा वाचो विधृतिं प्रयुजमग्निं मनवे प्रजापतये स्वाहाऽग्नये वैश्वानराय स्वाहा च प्रापय्य सततमाछृन्दन्तु ॥६६ ॥
भावार्थभाषाः - अत्राऽऽछृन्दन्त्विति पदं पूर्वमन्त्रादनुवर्त्तते। मनुष्याः पुरुषार्थेन वेदादिशास्त्राण्यधीत्योत्साहादीनुन्नीय व्यवहारपरमार्थक्रियाप्रयोगेणाभ्युदयिकनिःश्रेयसे समाप्नुवन्तु ॥६६ ॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - येथे यापूर्वीच्या मंत्रातील (आछन्दन्तु) या पदाची अनुवृती झालेली आहे. माणसांनी पुरुषार्थाने वेदादी शास्त्रांचे अध्ययन करून उत्साहाने व्यवहार व परमार्थ साधून इहलोक व परलोक यांचे सुख भोगावे.