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मि॒त्रस्य॑ चर्षणी॒धृतोऽवो॑ दे॒वस्य॑ सान॒सि। द्यु॒म्नं चि॒त्रश्र॑वस्तमम् ॥६२ ॥

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पद पाठ

मि॒त्रस्य॑। च॒र्ष॒णी॒धृत॒ इति॑ चर्षणि॒ऽधृतः॑। अवः॑। दे॒वस्य॑। सा॒न॒सि। द्यु॒म्नम्। चि॒त्रश्र॑वस्तम॒मिति॑ चि॒त्रश्र॑वःऽतमम् ॥६२ ॥

यजुर्वेद » अध्याय:11» मन्त्र:62


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

जो जिस पुरुष की स्त्री होवे वह उसके ऐश्वर्य की निरन्तर रक्षा करे, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे स्त्री ! तू (चर्षणीधृतः) अच्छी शिक्षा से मनुष्यों का धारण करने हारे (मित्रस्य) मित्र (देवस्य) कमनीय अपने पति के (चित्रश्रवस्तमम्) आश्चर्य्यरूप अन्नादि पदार्थ जिससे हों, ऐसे (सानसि) सेवन योग्य प्राचीन (द्युम्नम्) धन की (अवः) रक्षा कर ॥६२ ॥
भावार्थभाषाः - घर के काम करने में कुशल स्त्री को चाहिये कि घर के भीतर के सब काम अपने आधीन रख के ठीक बढ़ाया करे ॥६२ ॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

या यस्य स्त्री भवेत् सा तस्यैश्वर्यं सततं रक्षेदित्याह ॥

अन्वय:

(मित्रस्य) सुहृदः (चर्षणीधृतः) सुशिक्षया मनुष्याणां धर्त्तुः (अवः) रक्ष (देवस्य) कमनीयस्य पत्युः (सानसि) संभक्तव्यं पुराणम् (द्युम्नम्) धनम् (चित्रश्रवस्तमम्) चित्राण्याश्चर्य्यभूतानि श्रवांस्यन्नादीनि यस्मात् तम्। [अयं मन्त्रः शत०६.५.४.१० व्याख्यातः] ॥६२ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे स्त्रि ! त्वं चर्षणीधृतो मित्रस्य देवस्य पत्युश्चित्रश्रवस्तमं सानसि द्युम्नमवः ॥६२ ॥
भावार्थभाषाः - गृहकृत्यकुशलया स्त्रिया सर्वाण्यन्तर्गृहकृत्यानि स्वाधीनानि रक्षित्वा यथावदुन्नेयानि ॥६२ ॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - घरात कार्य करणाऱ्या कुशल स्त्रीने घरातील सर्व काम आपल्या स्वाधीन ठेवून व्यवस्थित व्यवहार करावा.