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आपो॒ हि ष्ठा म॑यो॒भुव॒स्ता न॑ऽऊ॒र्जे द॑धातन। म॒हे रणा॑य॒ चक्ष॑से ॥५० ॥

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पद पाठ

आपः॑। हि। स्थ। म॒यो॒भुव॒ इति॑ मयः॒ऽभुवः॑। ताः। नः॒। ऊ॒र्जे। द॒धा॒त॒न॒। म॒हे। रणा॑य। चक्ष॑से ॥५० ॥

यजुर्वेद » अध्याय:11» मन्त्र:50


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब विवाह किये स्त्री और पुरुष आपस में कैसे वर्त्तें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (आपः) जलों के समान शुभ गुणों में व्याप्त होनेवाली श्रेष्ठ स्त्रियो ! जो तुम लोग (मयोभुवः) सुख भोगनेवाली (स्थ) हो (ताः) वे तुम (ऊर्जे) बलयुक्त पराक्रम और (महे) बड़े-बड़े (चक्षसे) कहने योग्य (रणाय) सङ्ग्राम के लिये (नः) हम लोगों को (हि) निश्चय करके (दधातन) धारण करो ॥५० ॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे स्त्रियाँ अपने पतियों को तृप्त रक्खें, वैसे पति भी अपनी-अपनी स्त्रियों को सदा सुख देवें। ये दोनों युद्धकर्म में भी पृथक्-पृथक् न बसें अर्थात् इकट्ठे ही सदा वर्त्ताव रक्खें ॥५० ॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथ कृतविवाहाः स्त्रीपुरुषा अन्योन्यं कथं वर्त्तेरन्नित्याह ॥

अन्वय:

(आपः) आप इव शुभगुणव्यापिकाः (हि) खलु (स्थ) भवत। अत्र अन्येषामपि दृश्यते [अष्टा०६.३.१३७] इति दीर्घः। (मयोभुवः) सुखं भावुकाः (ताः) (नः) अस्माकम् (ऊर्जे) बलयुक्ताय (दधातन) धरत (महे) महते (रणाय) सङ्ग्रामाय (चक्षसे) ख्यातुं योग्याय ॥५० ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे जलवद्वर्त्तमाना आप इव याः स्त्रियः ! यूयं मयोभुवः स्थ ता ऊर्जे महे रणाय चक्षसे नो हि दधातन ॥५० ॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा स्त्रियः स्वपतीन् प्रीणयेयुस्तथैव पतयः स्वस्य स्त्रियः सदा सुखयन्तु। एते युद्धकर्मण्यपि पृथङ् न वसेयुरर्थात् सहैव सदा वर्त्तेरन् ॥५० ॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. स्त्री आपल्या पतीशी जसा व्यवहार करते तसे पुरुषानेही आपल्या पत्नीशी व्यवहार करून सुख द्यावे. दोघांनी युद्धकर्मातही वेगवेगळे राहू नये, तर सदैव एकत्र राहावे.